72 देशों से आवेदन, 35 देशों के विद्यार्थी; नालंदा विश्वविद्यालय में वैश्विक अंदाज में मना स्वतंत्रता दिवस

Written by Sanjay Kumar

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संजय कुमार
बिहारशरीफ (अपना नालंदा)। नालंदा विश्वविद्यालय में भारत का 80वां स्वतंत्रता दिवस पूरे उत्साह, गरिमा और राष्ट्रभक्ति की भावना के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया तथा उपस्थित विश्वविद्यालय समुदाय को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देते हुए भारत की विकास यात्रा, युवाशक्ति, वैश्विक सहयोग, समावेशी ज्ञान और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से अपने विचार रखे।
स्वतंत्रता दिवस समारोह में नालंदा विश्वविद्यालय के विभिन्न देशों से आए विद्यार्थी, शिक्षक, अधिकारी एवं कर्मचारी तथा विश्वविद्यालय की सहभागिता से जुड़े साझेदार बड़ी संख्या में शामिल हुए। विभिन्न देशों और संस्कृतियों से आए विद्यार्थियों की मौजूदगी ने समारोह को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया और नालंदा की उस प्राचीन परंपरा को जीवंत किया, जिसमें दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से विद्यार्थी ज्ञान अर्जित करने के लिए यहां पहुंचते थे।
1,000 विद्यार्थियों का आंकड़ा पार कर चुका है विश्वविद्यालय
अपने संबोधन में कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने नालंदा विश्वविद्यालय के बढ़ते अकादमिक और अंतरराष्ट्रीय विस्तार पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय अब 1,000 विद्यार्थियों की संख्या का आंकड़ा पार कर चुका है। वर्तमान में यहां 35 देशों के विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं, जबकि इस वर्ष विश्वविद्यालय को 72 देशों से आवेदन प्राप्त हुए हैं।
उन्होंने कहा कि अलग-अलग देशों से विद्यार्थियों का नालंदा विश्वविद्यालय में आना इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। नालंदा की पहचान सदियों से वैश्विक ज्ञान केंद्र के रूप में रही है और आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय उसी विरासत को समकालीन संदर्भों में आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।
युवाओं को बताया भारत के भविष्य का वास्तुकार
कुलपति ने भारत के भविष्य के निर्माण में युवाओं की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए विद्यार्थियों को “भारत के भविष्य के वास्तुकार” के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज का युवा केवल देश का विद्यार्थी नहीं, बल्कि आने वाले भारत के निर्माण में सक्रिय भागीदार है।
उन्होंने विद्यार्थियों से अपील की कि वे अपने योगदान को केवल कक्षा, परीक्षा और अकादमिक गतिविधियों तक सीमित न रखें। विश्वविद्यालय के प्रशासन, संचालन, सामाजिक गतिविधियों और व्यापक सामाजिक जिम्मेदारियों में भी विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिम्मेदार और जागरूक युवा ही लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक समरसता तथा देश की विकास यात्रा को नई दिशा दे सकते हैं।
विकसित भारत @2047 में ग्लोबल साउथ की भागीदारी पर जोर
प्रोफेसर चतुर्वेदी ने विकसित भारत @2047 के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की विकास यात्रा का लाभ केवल भारत तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ग्लोबल साउथ के साझेदार देशों तक भी पहुंचना चाहिए।
उन्होंने भारत की इस दृष्टि को नालंदा की प्राचीन सभ्यतागत परंपरा से जोड़ते हुए कहा कि सदियों पहले नालंदा में ज्ञान किसी भौगोलिक सीमा में बंधा नहीं था। दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले विद्वान और विद्यार्थी यहां ज्ञान का साझा अध्ययन, विकास और सह-निर्माण करते थे।


कुलपति ने कहा कि ज्ञान के माध्यम से दुनिया को जोड़ने, संवाद स्थापित करने और एक-दूसरे से सीखने की भावना नालंदा की परंपरा का अभिन्न हिस्सा रही है। आधुनिक दौर में वैश्वीकरण की अवधारणा के व्यापक रूप से सामने आने से बहुत पहले नालंदा इस विचार को व्यवहार में जी रहा था।
शोध और अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग को मिलेगा बढ़ावा
कुलपति ने आने वाले समय में विश्वविद्यालय की अकादमिक और संस्थागत प्राथमिकताओं की भी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय में अंतर-विषयक अकादमिक सहयोग को और मजबूत किया जाएगा। इसके लिए शोध क्लस्टरों और फैकल्टी कोलोक्वियम को प्रभावी बनाया जाएगा।
विद्यार्थियों की शोध गतिविधियों में भागीदारी बढ़ाने पर भी विशेष जोर दिया जाएगा। इसके साथ ही चुनिंदा विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ सेमेस्टर एक्सचेंज कार्यक्रम, विद्यार्थियों के नेतृत्व में अकादमिक जर्नल तथा वैश्विक साझेदार संस्थानों के साथ व्यापक अकादमिक जुड़ाव को बढ़ावा देने की योजना है।
उन्होंने विश्वविद्यालय के विस्तार होते अकादमिक दायरे की चर्चा करते हुए साइंस एंड टेक्नोलॉजी पॉलिसी स्टडीज, डेटा साइंस एंड एआई तथा संस्कृत जैसे नए कार्यक्रमों का उल्लेख किया। साथ ही विश्वविद्यालय में 27 अल्पकालिक कार्यक्रमों और 54 वैकल्पिक पाठ्यक्रमों के संचालन की जानकारी दी।
समाज से जुड़कर काम करने का आह्वान
कुलपति ने कहा कि किसी भी विश्वविद्यालय की भूमिका केवल परिसर के भीतर शिक्षा और शोध तक सीमित नहीं हो सकती। विश्वविद्यालय को आसपास के समाज और समुदायों से भी लगातार जुड़ना चाहिए।
उन्होंने विद्यार्थियों से परिसर से बाहर समुदायों के साथ सार्थक जुड़ाव स्थापित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि सामाजिक गतिविधियों और स्वैच्छिक कार्यों के माध्यम से विद्यार्थियों में संवेदनशीलता, सामाजिक प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है।
इस संदर्भ में उन्होंने LEAP 2.0 का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इसके लिए इस वर्ष 40 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को सहयोग उपलब्ध कराने के साथ-साथ विश्वविद्यालय और आसपास के समुदायों के लिए सार्थक स्वैच्छिक योगदान को प्रोत्साहित करना है।
बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप तैयार हों विद्यार्थी
कुलपति ने तेजी से बदलती वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए विद्यार्थियों को व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में किसी एक विषय का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों को अपने विषय की सीमाओं से बाहर निकलकर दुनिया में हो रहे बदलावों को समझना होगा।
उन्होंने विद्यार्थियों से भू-राजनीतिक, आर्थिक, तकनीकी और पर्यावरणीय चुनौतियों को समझने तथा उनके व्यापक प्रभावों का अध्ययन करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को शोध, कौशल विकास और व्यावहारिक सीखने के माध्यम से भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना भी है।
उन्होंने सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध सूचनाओं को लेकर विद्यार्थियों को सजग रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में सूचनाओं की उपलब्धता बढ़ी है, लेकिन हर सूचना सही हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए विद्यार्थियों को तथ्यों की जांच करने और सूचनाओं के प्रति आलोचनात्मक एवं विवेकपूर्ण दृष्टिकोण विकसित करने की आवश्यकता है।
‘विश्व न्याय, शांति और सतत विकास’ पर विशेष पैनल चर्चा
स्वतंत्रता दिवस समारोह के अवसर पर “विश्व न्याय, शांति और सतत विकास : विश्वविद्यालयों की भूमिका” विषय पर विशेष पैनल चर्चा का भी आयोजन किया गया। इसकी अध्यक्षता कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने की।
पैनल चर्चा में प्रोफेसर थॉमस पोगे, फाउंडिंग डायरेक्टर, ग्लोबल जस्टिस प्रोग्राम एवं लेटनर प्रोफेसर ऑफ फिलॉसफी एंड इंटरनेशनल अफेयर्स, येल विश्वविद्यालय; श्री एरिक सोलहाइम, नॉर्वे के पूर्व पर्यावरण एवं अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्री; प्रोफेसर अमिताभ मट्टू, डीन, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली; तथा प्रोफेसर अंजू शरण उपाध्याय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने सहभागिता की।
चर्चा के दौरान वैश्विक न्याय, शांति, स्थिरता, सतत विकास और तेजी से बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के संदर्भ में विश्वविद्यालयों की भूमिका पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि विश्वविद्यालय ज्ञान और शोध के केंद्र होने के साथ-साथ वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए संवाद और सहयोग के महत्वपूर्ण मंच भी बन सकते हैं।
विदेशी विद्यार्थियों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां
स्वतंत्रता दिवस समारोह में नालंदा विश्वविद्यालय के विभिन्न देशों से आए विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी संस्कृति और परंपराओं पर आधारित प्रस्तुतियां भी दीं। अलग-अलग देशों से आए विद्यार्थियों की सांस्कृतिक सहभागिता ने समारोह को विशेष आकर्षण प्रदान किया।
विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों में विभिन्न संस्कृतियों की विविधता और आपसी जुड़ाव की झलक देखने को मिली। भारत के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर विदेशी विद्यार्थियों की सहभागिता ने यह संदेश दिया कि नालंदा की धरती आज भी अलग-अलग देशों, संस्कृतियों और विचारों को एक मंच पर लाने की क्षमता रखती है।
समारोह के दौरान विश्वविद्यालय परिसर में राष्ट्रभक्ति और उत्साह का वातावरण बना रहा। ध्वजारोहण के बाद उपस्थित लोगों ने देश की एकता, अखंडता और प्रगति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।
नालंदा विश्वविद्यालय का यह स्वतंत्रता दिवस समारोह केवल राष्ट्रीय पर्व का आयोजन नहीं रहा, बल्कि युवाशक्ति, वैश्विक सहभागिता, ज्ञान के आदान-प्रदान, सामाजिक जिम्मेदारी और सतत विकास को लेकर एक व्यापक संदेश देने वाला अवसर भी बना। कुलपति के संबोधन और पैनल चर्चा के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि आधुनिक नालंदा को अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा से प्रेरणा लेते हुए भारत और दुनिया के बीच ज्ञान, संवाद और सहयोग का सेतु बनने की दिशा में आगे बढ़ना है।

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