कुदरत की टूटती कड़ियां बचाना जरूरी, क्योंकि शेर सिर्फ जंगल का राजा नहीं, पारिस्थितिकी संतुलन का प्रहरी है

Written by Sanjay Kumar

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विश्व शेर दिवस पर विशेष प्रस्तुति : वन पारिस्थितिकी तंत्र में शेर की भूमिका का विवेचनात्मक मूल्यांकन

आलेख :
प्रो. श्याम नंदन प्रसाद, पर्यावरणविद्
प्रो. नंदीपति तिवारी, जंतु विशेषज्ञ
डॉ. रश्मि कोमल, सहायक प्राध्यापक, वनस्पति शास्त्र विभाग, साइंस कॉलेज, पटना
डॉ. रवि प्रभाकर, सहायक प्राध्यापक, पर्यावरण विज्ञान विभाग, टी.पी.एस. कॉलेज, पटना
डॉ. कौशलेंद्र कुमार, सहायक प्राध्यापक, वनस्पति शास्त्र विभाग, महाबोधि कॉलेज, नालंदा
डॉ. अजीत कुमार सिंह, सहायक प्राध्यापक, पर्यावरण विज्ञान विभाग, किसान कॉलेज, सोहसराय, नालंदा
डॉ. नरेंद्र प्रसाद राय, फैकल्टी, पर्यावरण एवं जल प्रबंधन विभाग, ए.एन. कॉलेज, पटना
डॉ. भगवान मिश्रा, सहायक प्राध्यापक, जंतु शास्त्र विभाग, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, बिहार
शेर का अस्तित्व, जंगल के संतुलन की गारंटी
यह निर्विवाद सत्य है कि प्रकृति का प्रत्येक जीव अपने आप में महत्वपूर्ण है। किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती केवल पेड़-पौधों या किसी एक प्रजाति पर निर्भर नहीं होती, बल्कि असंख्य जीव-जंतुओं, वनस्पतियों, सूक्ष्मजीवों और उनके बीच बनने वाले जटिल संबंधों से पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होता है।


इसी प्राकृतिक व्यवस्था में शेर यानी Lion एक शीर्ष शिकारी (Apex Predator) के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह शाकाहारी जीवों की आबादी को नियंत्रित करने में योगदान देता है और इस प्रकार वनस्पतियों, घासभूमियों तथा अन्य जीवों पर पड़ने वाले दबाव को संतुलित करने में मदद करता है। आधिकारिक पर्यावरण मंत्रालय की सामग्री भी शेर को ऐसा शीर्ष शिकारी मानती है, जो शाकाहारी जीवों की आबादी को नियंत्रित कर पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता को प्रभावित करता है। �
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इसीलिए शेर का संरक्षण केवल एक वन्यजीव को बचाने का प्रयास नहीं है। यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता और प्राकृतिक खाद्य-जाल को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
विश्व शेर दिवस क्यों महत्वपूर्ण है?
हर वर्ष 10 अगस्त को विश्व शेर दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य दुनिया भर में शेरों के संरक्षण, उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा और उनके सामने मौजूद चुनौतियों के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना है। �
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शेर जितना शक्तिशाली और आकर्षक दिखाई देता है, उसके अस्तित्व के सामने चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर रही हैं। आवास का सिकुड़ना, मानव-वन्यजीव संघर्ष, शिकार, बीमारी, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता मानवीय दबाव दुनिया के कई हिस्सों में शेरों के लिए चुनौती बने हुए हैं।
वैश्विक स्तर पर शेरों की संख्या और उनके प्राकृतिक आवास में लंबे समय से गिरावट चिंता का विषय रही है। भारत में हालांकि एशियाई शेर के संरक्षण की कहानी उम्मीद जगाती है।
भारत : एशियाई शेरों का अंतिम प्राकृतिक आश्रय
भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहां एशियाई शेर (Asiatic Lion) का जंगली प्राकृतिक आवास मौजूद है। भारत में इसकी प्रमुख आबादी गुजरात के ग्रेटर गिर लैंडस्केप में पाई जाती है।
एशियाई शेरों की आबादी में पिछले वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
वर्ष
एशियाई शेरों की अनुमानित संख्या
2010
411
2015
523
2020
674
2025
891
2025 की गणना के अनुसार देश में एशियाई शेरों की संख्या बढ़कर 891 हो गई है। 2020 की तुलना में यह लगभग 32 प्रतिशत की वृद्धि है। �
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यह वृद्धि भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों के लिए निश्चित रूप से उत्साहजनक संकेत है।
प्रोजेक्ट लायन : संरक्षण की दिशा में बड़ी पहल
भारत सरकार ने 15 अगस्त 2020 को प्रोजेक्ट लायन की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य केवल शेरों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उनके पूरे प्राकृतिक परिदृश्य को सुरक्षित और मजबूत बनाना है। �
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प्रोजेक्ट लायन के अंतर्गत शेरों के आवास का संरक्षण एवं पुनर्स्थापन, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा, वैज्ञानिक प्रबंधन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी तथा बीमारी और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों से निपटने जैसे पहलुओं पर जोर दिया जा रहा है। �
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आधुनिक तकनीक भी संरक्षण कार्य का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। वैज्ञानिक निगरानी, रेडियो टेलीमेट्री, कैमरा ट्रैप और अन्य तकनीकों के माध्यम से शेरों की गतिविधियों, आवास और उनके व्यवहार को समझने का प्रयास किया जा रहा है।
शेर कम होंगे तो क्या होगा?
प्रकृति में कोई भी प्रजाति अलग-थलग होकर नहीं रहती। एक जीव की संख्या में बड़ा बदलाव दूसरे जीवों और वनस्पतियों को भी प्रभावित कर सकता है।
यदि शीर्ष शिकारी की संख्या घटती है तो शाकाहारी जीवों की आबादी पर नियंत्रण कमजोर हो सकता है। इससे वनस्पतियों पर चराई का दबाव बढ़ सकता है। इसके परिणामस्वरूप घास, झाड़ियों और छोटे पौधों की पुनरुत्पत्ति प्रभावित हो सकती है।
इस पूरी प्रक्रिया का प्रभाव धीरे-धीरे दूसरे जीवों, पक्षियों, कीटों और सूक्ष्मजीवों तक पहुंच सकता है।
यही कारण है कि खाद्य श्रृंखला (Food Chain) और खाद्य जाल (Food Web) को समझना जरूरी है। प्रकृति की प्रत्येक कड़ी दूसरी कड़ियों से जुड़ी हुई है।
शेर इस व्यवस्था में केवल शिकारी नहीं, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित करने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
कुदरत की टूटती कड़ियों की वजह क्या है?
आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है—प्राकृतिक आवासों का लगातार बदलना और उनका विखंडन।
शेरों के सामने भी कई तरह के खतरे हैं—

  1. प्राकृतिक आवास का नुकसान :
    जंगलों और घासभूमियों का बदलता स्वरूप वन्यजीवों के लिए सुरक्षित क्षेत्र को सीमित करता है।
  2. मानव-वन्यजीव संघर्ष :
    जब जंगल और मानव बस्तियों के बीच दूरी कम होती है तो संघर्ष की संभावना बढ़ती है।
  3. शिकार और अवैध गतिविधियां :
    वन्यजीवों का अवैध शिकार जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा है।
  4. जलवायु परिवर्तन :
    बदलता तापमान, वर्षा का स्वरूप और जल स्रोतों में परिवर्तन वन्यजीवों के आवास को प्रभावित कर सकते हैं।
  5. बीमारियों का खतरा :
    एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में किसी प्रजाति की बड़ी आबादी होने पर संक्रामक रोगों का जोखिम भी संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो जाता है।
    गिर से आगे बढ़ता शेरों का संसार
    भारत के लिए यह गौरव का विषय है कि एशियाई शेरों की आबादी में लगातार वृद्धि हुई है। 2025 में इनकी संख्या 891 तक पहुंचना संरक्षण प्रयासों की सफलता का महत्वपूर्ण संकेत है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार शेर अब गुजरात के ग्रेटर गिर लैंडस्केप में नए क्षेत्रों, नदी गलियारों और अन्य उपयुक्त क्षेत्रों तक भी फैल रहे हैं। �
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    बर्दा वन्यजीव अभयारण्य भी शेरों के संरक्षण के लिहाज से उभरता हुआ क्षेत्र है। प्राकृतिक रूप से शेरों के वहां पहुंचने के बाद यह क्षेत्र उनकी दूसरी आबादी के विकास की संभावनाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण बन रहा है। �
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    यह विस्तार केवल संख्या बढ़ने का संकेत नहीं है, बल्कि यह भी बताता है कि यदि उपयुक्त आवास, भोजन, पानी और सुरक्षित गलियारे उपलब्ध हों तो वन्यजीव अपने प्राकृतिक क्षेत्र का विस्तार कर सकते हैं।
    राष्ट्रीय प्रतीक में शेर : संस्कृति और प्रकृति का संगम
    भारत में शेर का महत्व केवल जंगल और वन्यजीव संरक्षण तक सीमित नहीं है। सारनाथ के सिंह स्तंभ की सिंह-मुद्रा भारत के राजकीय प्रतीक का आधार है।
    यह हमारे इतिहास, संस्कृति, शक्ति और गौरव का प्रतीक है। इसलिए शेर को बचाना हमारी प्राकृतिक विरासत के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत को बचाने का भी प्रयास है।
    सिर्फ संख्या नहीं, सुरक्षित भविष्य जरूरी
    शेरों की संख्या बढ़ना निश्चित रूप से अच्छी खबर है, लेकिन संरक्षण की असली सफलता केवल आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती।
    हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि—
    शेरों को पर्याप्त और सुरक्षित प्राकृतिक आवास मिले।
    उनके आवागमन के प्राकृतिक गलियारे सुरक्षित रहें।
    स्थानीय समुदायों को संरक्षण अभियान में भागीदार बनाया जाए।
    मानव-वन्यजीव संघर्ष को वैज्ञानिक तरीके से कम किया जाए।
    बीमारियों की निगरानी और उपचार की मजबूत व्यवस्था हो।
    शेरों के शिकार और अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण रहे।
    जंगलों और घासभूमियों की गुणवत्ता में सुधार किया जाए।
    वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक तकनीक का अधिक उपयोग हो।
    बच्चों और युवाओं में वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा की जाए।
    आने वाली पीढ़ियों के लिए बचानी होगी यह कड़ी
    प्रकृति ने हमें एक ऐसा संसार दिया है जिसमें हर जीव की अपनी भूमिका है। किसी एक प्रजाति का समाप्त होना केवल उस प्रजाति का अंत नहीं होता, बल्कि वह प्रकृति की उस जटिल श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी के टूटने जैसा है।
    शेर की दहाड़ जंगल में केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं है। वह हमें यह याद दिलाती है कि जंगल जीवित है, प्रकृति सक्रिय है और पारिस्थितिकी तंत्र अपना काम कर रहा है।
    इसलिए विश्व शेर दिवस केवल शेरों के प्रति प्रेम और आकर्षण व्यक्त करने का अवसर नहीं, बल्कि यह संकल्प लेने का दिन भी है कि हम अपने जंगलों, वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करेंगे।
    भारत में एशियाई शेरों की बढ़ती संख्या उम्मीद की किरण है। 2015 में 523 से बढ़कर 2025 में 891 तक पहुंचना संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। �
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    लेकिन यह यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती।
    कुदरत की जो कड़ियां अभी बची हुई हैं, उन्हें टूटने से रोकना ही हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
    यदि जंगल सुरक्षित होंगे, तो वन्यजीव सुरक्षित होंगे।
    वन्यजीव सुरक्षित होंगे, तो जैव विविधता सुरक्षित होगी।
    और जैव विविधता सुरक्षित होगी, तभी आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ, संतुलित और स्वस्थ पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकेगा।
    शेर को बचाना दरअसल प्रकृति के संतुलन को बचाना है।

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