आलेख : डॉ. श्याम नंदन प्रसाद
पूर्व प्राचार्य एवं पर्यावरणविद्
मुख्य समन्वयक, वनस्पति शास्त्र विभाग, नालंदा खुला विश्वविद्यालय, नालंदा, बिहार
सिटी एंबेसडर ऑफ पटना, विकसित भारत अभियान @2047 (GLF), बिहार
3 अक्टूबर को विश्व प्रकृति दिवस मनाया जा रहा है। यह दिवस प्रकृति के संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के प्रति लोगों को जागरूक करने का अवसर प्रदान करता है। इसका मूल संदेश यही है कि मानव जीवन और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी मानव सभ्यता सुरक्षित रह सकेगी।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विश्व प्रकृति दिवस (World Nature Day) 3 अक्टूबर को तथा विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस (World Nature Conservation Day) 28 जुलाई को मनाया जाता है। दोनों अवसर प्रकृति और पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारियों की याद दिलाते हैं।
प्रकृति से बढ़ती दूरी का परिणाम है जलवायु संकट
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के गंभीर दुष्प्रभावों का सामना कर रही है। कहीं असामान्य रूप से अत्यधिक वर्षा हो रही है, तो कहीं लंबे समय तक सूखे की स्थिति बनी रहती है। कहीं भीषण गर्मी नए रिकॉर्ड बना रही है, तो कहीं बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं जनजीवन को प्रभावित कर रही हैं।
इन परिस्थितियों को केवल प्राकृतिक घटनाओं के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। मानव गतिविधियों ने पर्यावरणीय असंतुलन को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, लेकिन हमारी आवश्यकताएं और उपभोग की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। जंगलों की कटाई, नदियों का प्रदूषण, भूजल का अत्यधिक दोहन, जीवाश्म ईंधन का अत्यधिक इस्तेमाल और प्लास्टिक प्रदूषण जैसी समस्याएं प्रकृति पर लगातार दबाव बढ़ा रही हैं।
प्रकृति हमें जीवन के लिए आवश्यक हवा, पानी, भोजन, औषधियां और अनेक प्रकार के संसाधन उपलब्ध कराती है। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग हमारा अधिकार होने के साथ-साथ हमारी जिम्मेदारी भी है। हमें संसाधनों का उपयोग करना चाहिए, लेकिन उनका दुरुपयोग नहीं।
पेड़ों की कटाई से बिगड़ रहा पर्यावरणीय संतुलन
पेड़-पौधे पृथ्वी के जीवन-तंत्र का आधार हैं। वे वायुमंडल को संतुलित रखने, मिट्टी के संरक्षण, जलचक्र को बनाए रखने और जैव विविधता को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद विकास और निर्माण के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जाती है।
जब जंगल कम होते हैं तो केवल पेड़ों की संख्या नहीं घटती, बल्कि असंख्य जीव-जंतुओं का प्राकृतिक आवास भी प्रभावित होता है। इससे जैव विविधता पर संकट गहराता है और पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ता है।
इसलिए विकास की योजनाओं में पर्यावरणीय प्रभावों को प्राथमिकता के साथ समझना आवश्यक है। जहां पेड़ों की कटाई अपरिहार्य हो, वहां वैज्ञानिक तरीके से क्षतिपूर्ति वनीकरण और स्थानीय पारिस्थितिकी की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
गंगा की स्वच्छता हमारी सामूहिक जिम्मेदारी
भारत की नदियां केवल जलधाराएं नहीं हैं, बल्कि हमारी सभ्यता, संस्कृति और अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा हैं। विशेष रूप से गंगा का भारतीय जनमानस में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। हम सदियों से उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ “मां गंगा” कहते आए हैं।
लेकिन आज गंगा सहित अनेक नदियां प्रदूषण की समस्या से जूझ रही हैं। घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक और अन्य प्रदूषक नदियों की जल गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।
यह प्रश्न हमें स्वयं से पूछना होगा कि जिस नदी को हम मां का दर्जा देते हैं, उसे प्रदूषित करने का अधिकार हमें किसने दिया? गंगा की निर्मलता केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए समाज, उद्योग, स्थानीय निकाय, प्रशासन और प्रत्येक नागरिक को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
प्रकृति मालिक नहीं, जीवन का आधार है
बदलता मौसम हमें एक महत्वपूर्ण संदेश दे रहा है कि मनुष्य प्रकृति से ऊपर नहीं है। हम प्रकृति के मालिक नहीं, बल्कि उसी पारिस्थितिकी तंत्र का एक हिस्सा हैं। हमारी सांस, हमारा भोजन, हमारा पानी और हमारा जीवन प्रकृति पर निर्भर है।
भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् दिवंगत डॉ. माधव डी. गाडगिल ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के संबंध में महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए थे। उनका मत था कि यह धारणा सही नहीं है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ नहीं चल सकते। पर्यावरणीय मानकों का कठोरता से पालन करते हुए विकास किया जा सकता है।
मैं उनके इस विचार से सहमत हूं। वास्तव में आज आवश्यकता विकास को रोकने की नहीं, बल्कि सतत और पर्यावरण-सम्मत विकास को अपनाने की है। ऐसा विकास, जिसमें वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताएं पूरी हों और आने वाली पीढ़ियों के अधिकार भी सुरक्षित रहें।
विकसित भारत के लिए प्रकृति का संरक्षण जरूरी
हम सभी चाहते हैं कि भारत विश्व पटल पर एक विकसित और समृद्ध राष्ट्र के रूप में स्थापित हो। लेकिन विकसित राष्ट्र का अर्थ केवल बड़ी इमारतें, चौड़ी सड़कें, आधुनिक तकनीक और औद्योगिक विकास नहीं है। वास्तविक विकास वही है जिसमें नागरिकों को स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी, स्वस्थ पर्यावरण और बेहतर जीवन मिले।
यदि हमें विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करना है तो पर्यावरण संरक्षण को विकास की मुख्यधारा में शामिल करना होगा।
हमें अधिक से अधिक पेड़ लगाने और लगाए गए पौधों की देखभाल करने की आदत विकसित करनी होगी। नदियों और जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाना होगा। वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना होगा। पानी की बर्बादी रोकनी होगी। प्लास्टिक के अनावश्यक इस्तेमाल को कम करना होगा। ऊर्जा की बचत करनी होगी और स्वच्छ ऊर्जा के विकल्पों को बढ़ावा देना होगा।
साथ ही पशु-पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता विकसित करनी होगी। प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना केवल पर्यावरणविदों का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
अब चेतने का समय
विश्व प्रकृति दिवस केवल एक दिवस मनाने का अवसर नहीं होना चाहिए। यह आत्ममंथन का दिन भी होना चाहिए। हमें विचार करना होगा कि हमारी जीवनशैली और गतिविधियों का प्रकृति पर कितना प्रभाव पड़ रहा है।
यदि हम आज सचेत नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ियों को जल, स्वच्छ हवा, हरित क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों की कमी जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
प्रकृति को बचाने के लिए किसी बड़े अभियान की शुरुआत हमेशा बड़े स्तर से ही हो, यह आवश्यक नहीं है। एक व्यक्ति एक पेड़ लगाए और उसकी देखभाल करे, पानी की एक बूंद बचाए, प्लास्टिक की एक वस्तु का उपयोग कम करे, अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखे और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करे—तो छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।
आज विश्व प्रकृति दिवस के अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम प्रकृति का दोहन नहीं, उसका संरक्षण करेंगे; विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन को महत्व देंगे और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग आने वाली पीढ़ियों को ध्यान में रखकर करेंगे।
प्रकृति सुरक्षित होगी तो पर्यावरण सुरक्षित होगा, पर्यावरण सुरक्षित होगा तो मानव जीवन सुरक्षित होगा और मानव जीवन सुरक्षित होगा तभी विकसित भारत का सपना वास्तव में साकार हो सकेगा।
आइए, विश्व प्रकृति दिवस पर हम सब मिलकर प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का संकल्प लें और भारत को स्वच्छ, सुंदर, हरित, स्वस्थ एवं पर्यावरण-संतुलित राष्ट्र बनाने की दिशा में अपना योगदान दें।







