प्रकृति का सम्मान ही सच्ची आराधना, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता
आलेख: श्याम नंदन प्रसाद, विद्यावाचस्पति (पादप पारिस्थितिकी)**
पूर्व प्राचार्य एवं पर्यावरणविद्
पटना, बिहार, भारत
पर्यावरण संरक्षण वर्तमान समय की सबसे बड़ी मांग
आज संपूर्ण विश्व पर्यावरण संकट की गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, वनों की अंधाधुंध कटाई, जलस्रोतों का प्रदूषण, जैव विविधता का विनाश और प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन मानव सभ्यता के समक्ष गंभीर प्रश्न बनकर खड़े हैं। विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति का जिस प्रकार दोहन किया है, उसका दुष्परिणाम अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। कहीं भीषण गर्मी और सूखे की स्थिति है, तो कहीं अतिवृष्टि, बाढ़, भूस्खलन और चक्रवाती तूफानों की घटनाएं जनजीवन को प्रभावित कर रही हैं।
इन परिस्थितियों में हमें गंभीरता से विचार करना होगा कि आखिर प्रकृति का संतुलन क्यों बिगड़ रहा है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इस प्रश्न का उत्तर खोजने पर स्पष्ट होता है कि मानवीय गतिविधियों ने पर्यावरणीय संकट को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग, प्लास्टिक प्रदूषण तथा प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन ने पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।
जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान में वृद्धि अब केवल वैज्ञानिक विमर्श का विषय नहीं रह गए हैं, बल्कि ये हमारे वर्तमान और भविष्य से जुड़े जीवन-मरण के प्रश्न बन चुके हैं। यदि समय रहते हमने अपनी जीवनशैली और विकास की दिशा में आवश्यक बदलाव नहीं किए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
प्रकृति हमें निरंतर संकेत दे रही है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करना अनिवार्य है। हाल के वर्षों में नेपाल सहित विभिन्न क्षेत्रों में आई विनाशकारी बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं ने हमें यह सोचने के लिए विवश किया है कि पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी कितनी महंगी पड़ सकती है। हालांकि किसी एक आपदा को केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम मानना उचित नहीं होगा, लेकिन यह निर्विवाद है कि जलवायु परिवर्तन, भूमि उपयोग में बदलाव और पारिस्थितिक तंत्र की क्षति अनेक क्षेत्रों में आपदाओं के जोखिम को बढ़ा सकती है।
हमें यह मूल मंत्र सदैव याद रखना चाहिए कि यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, तभी मानव जीवन भी सुरक्षित रह सकेगा। इसलिए आज आवश्यकता केवल पर्यावरण पर चर्चा करने की नहीं, बल्कि उसके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने की है।
मां दुर्गा प्रकृति की शक्ति और सृष्टि के संतुलन की प्रतीक
भारतीय सनातन संस्कृति में प्रकृति को केवल भौतिक संसाधनों का भंडार नहीं माना गया है, बल्कि उसे जीवनदायिनी शक्ति के रूप में सम्मान दिया गया है। नदियों को माता, पृथ्वी को धरती माता, वायु को जीवन का आधार और वृक्षों को जीवनदायी मानने की परंपरा हमारी सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग रही है। इसी व्यापक दृष्टिकोण में मां दुर्गा की उपासना का भी विशेष महत्व है।
देवी माहात्म्य अथवा दुर्गा सप्तशती में वर्णित प्रसिद्ध स्तुति है—
“या देवी सर्वभूतेषु प्रकृतिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”
इसका भावार्थ है कि जो देवी समस्त प्राणियों में प्रकृति के रूप में विद्यमान हैं, उन्हें बार-बार नमन है।
यह श्लोक हमें प्रकृति और शक्ति के बीच गहरे संबंध का बोध कराता है। मां दुर्गा की आराधना के माध्यम से हम उस सृजनात्मक शक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं, जो समस्त जीव-जगत के अस्तित्व का आधार है। प्रकृति के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है। जल, वायु, मिट्टी, सूर्य का प्रकाश, वनस्पतियां और जीव-जंतु एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इनमें से किसी एक घटक का असंतुलन संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है।
इस दृष्टि से मां दुर्गा की उपासना हमें केवल आध्यात्मिक शक्ति ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों को समझने की प्रेरणा भी देती है। जब हम देवी को प्रकृति के रूप में देखते हैं, तब वृक्षों की रक्षा, नदियों की स्वच्छता, वन्यजीवों का संरक्षण और पृथ्वी के संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग हमारी नैतिक जिम्मेदारी बन जाता है।
आज के संदर्भ में यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। प्रश्न यह नहीं है कि हम प्रकृति की महत्ता को स्वीकार करते हैं या नहीं, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या हमारे व्यवहार में प्रकृति के प्रति सम्मान दिखाई देता है? यदि हम एक ओर मां दुर्गा की पूजा करें और दूसरी ओर नदियों को प्रदूषित करें, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई करें तथा प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करें, तो हमारी आराधना औरआचरण के बीच विरोधाभास उत्पन्न हो जाता है।
सच्ची श्रद्धा तभी सार्थक होगी, जब वह हमारे दैनिक जीवन में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और संरक्षण की भावना के रूप में प्रकट हो।
नवरात्रि और महानवमी: आध्यात्मिक साधना के साथ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व
सनातन परंपरा में नवरात्रि शक्ति की उपासना का महत्वपूर्ण पर्व है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना की जाती है। यह साधना मनुष्य को आत्मसंयम, सकारात्मकता, साहस, त्याग और कल्याण की भावना से जोड़ती है।
यदि हम इस पर्व को व्यापक दृष्टिकोण से देखें, तो इसमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवन के मूलभूत तत्वों के महत्व को समझने की प्रेरणा भी निहित है। प्रकृति हमारे जीवन की प्रत्येक आवश्यकता पूरी करती है। हमें पीने के लिए जल, सांस लेने के लिए वायु, भोजन के लिए अन्न, औषधियों के लिए वनस्पतियां और रहने के लिए भूमि प्रदान करती है। इसलिए प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना हमारी सांस्कृतिक और मानवीय जिम्मेदारी है।
महानवमी नवरात्रि का अत्यंत पावन अवसर है। इस दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं में मां सिद्धिदात्री को सिद्धियों और कल्याणकारी शक्तियों की अधिष्ठात्री माना गया है। उनका स्मरण हमें यह विचार करने का अवसर देता है कि वास्तविक समृद्धि केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन, शांति और कल्याण की स्थापना में भी निहित है।
महानवमी के अवसर पर जब हम मां की आराधना करते हैं, तो हमें उन प्राकृतिक तत्वों के महत्व को भी समझना चाहिए, जिनके बिना हमारा अस्तित्व संभव नहीं है। पृथ्वी हमें आधार देती है, जल जीवन प्रदान करता है, वायु प्राणवायु का स्रोत है, अग्नि ऊर्जा का प्रतीक है और आकाश व्यापकता का बोध कराता है। भारतीय दर्शन में इन पंचमहाभूतों को सृष्टि की संरचना और जीवन के आधार के रूप में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
इन तत्वों के प्रति सम्मान का वास्तविक अर्थ है—जल की बर्बादी रोकना, वायु प्रदूषण कम करना, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना, ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग करना और प्राकृतिक संसाधनों को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना।
इस प्रकार महानवमी का पर्व हमें भक्ति के साथ-साथ अपने पर्यावरणीय दायित्वों का स्मरण कराने वाला अवसर भी बन सकता है।
हवन, कन्या पूजन और सेवा की भावना का व्यापक संदेश
महानवमी के अवसर पर अनेक स्थानों पर हवन, पूजन और कन्या पूजन की परंपरा निभाई जाती है। धार्मिक आस्था के अनुसार हवन को पवित्रता, श्रद्धा और सकारात्मक संकल्प का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर हमें अपने मन में व्याप्त नकारात्मक विचारों, स्वार्थ और प्रकृति के प्रति उदासीनता को त्यागने का संकल्प भी लेना चाहिए।
पर्यावरण के दृष्टिकोण से यह समझना आवश्यक है कि धार्मिक अनुष्ठान करते समय स्वच्छता और पर्यावरणीय सावधानियों का पालन किया जाए। हवन में निर्धारित सामग्री का संयमित उपयोग हो, प्लास्टिक और हानिकारक पदार्थों को न जलाया जाए तथा पूजा के बाद बची सामग्री को नदियों, तालाबों या अन्य जलस्रोतों में न फेंका जाए। पूजा स्थलों की सफाई और कचरे का उचित निस्तारण भी हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए।
इसी प्रकार महानवमी पर नौ कुंवारी कन्याओं को मां दुर्गा का स्वरूप मानकर पूजन करने की परंपरा स्त्री शक्ति के सम्मान और आदर का संदेश देती है। बालक को भैरव बाबा के प्रतीक के रूप में पूजने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है।
इन परंपराओं का व्यापक मानवीय संदेश यह है कि हमें प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सम्मान, संवेदना और सेवा का भाव रखना चाहिए। जिस प्रकार हम धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धा व्यक्त करते हैं, उसी प्रकार हमें समाज के कमजोर वर्गों, बच्चों, महिलाओं और जरूरतमंद लोगों के कल्याण के लिए भी सक्रिय रहना चाहिए।
प्रकृति संरक्षण भी इसी सेवा भावना का विस्तार है, क्योंकि स्वच्छ जल, शुद्ध वायु और सुरक्षित पर्यावरण प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है। पर्यावरणीय संकट का सबसे अधिक प्रभाव अक्सर उन लोगों पर पड़ता है, जिनके पास आपदाओं से बचने और उनके बाद जीवन को पुनः व्यवस्थित करने के साधन सीमित होते हैं।
इसलिए मां दुर्गा की आराधना के साथ मानवता, सामाजिक उत्तरदायित्व और पर्यावरण संरक्षण को जोड़ना समय की मांग है।
नवरात्रि में जौ का अंकुरण: बीज, मिट्टी और कृषि संस्कृति का महत्व
नवरात्रि की शुरुआत में कलश स्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा अनेक परिवारों में प्रचलित है। नौ दिनों के दौरान जौ के बीज अंकुरित होकर पौधों का रूप लेने लगते हैं। यह दृश्य हमें प्रकृति की अद्भुत सृजन क्षमता और जीवन के निरंतर विकास का सहज अनुभव कराता है।

एक छोटा-सा बीज अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर अंकुरित होता है और धीरे-धीरे पौधे में विकसित होता है। इसके लिए उचित नमी, तापमान, ऑक्सीजन और अन्य अनुकूल परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया हमें बताती है कि जीवन का विकास प्राकृतिक परिस्थितियों और पर्यावरणीय संतुलन पर निर्भर करता है।
जौ का अंकुरण कृषि संस्कृति, बीजों के महत्व और नई फसल के प्रति आशा का प्रतीक भी माना जा सकता है। यह हमें याद दिलाता है कि अन्न उत्पादन केवल किसान के परिश्रम का परिणाम नहीं है, बल्कि इसमें मिट्टी, जल, सूर्य के प्रकाश, सूक्ष्मजीवों और अनेक प्राकृतिक प्रक्रियाओं का योगदान रहता है।
पादप पारिस्थितिकी के दृष्टिकोण से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना, जैविक पदार्थों की उपलब्धता, जल संरक्षण और जैव विविधता का संरक्षण कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। यदि मिट्टी का क्षरण बढ़ता है, जलस्रोत सूखते हैं और कृषि भूमि रासायनिक प्रदूषण से प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
जौ के अंकुर हमें यह संदेश देते हैं कि जिस प्रकार एक बीज को विकसित होने के लिए अनुकूल वातावरण चाहिए, उसी प्रकार मानव जीवन और संपूर्ण जीव-जगत को सुरक्षित भविष्य के लिए स्वस्थ पर्यावरण की आवश्यकता है।
इसलिए नवरात्रि में जौ बोने की परंपरा को हम प्रकृति के प्रति आभार, कृषि के सम्मान और बीजों तथा जैव विविधता के संरक्षण के संकल्प से भी जोड़ सकते हैं।

प्रकृति का अंधाधुंध दोहन नहीं, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक
आज मानव सभ्यता विज्ञान, तकनीक और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति कर चुकी है। आधुनिक सुविधाओं ने जीवन को सरल बनाया है, लेकिन इस प्रगति के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारियां भी बढ़ी हैं। यदि विकास प्रकृति की कीमत पर होता है, तो उसके लाभ लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकते।
वनों की कटाई से अनेक जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट होते हैं। पेड़ों की संख्या कम होने से कार्बन को अवशोषित करने की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित होती है। जलस्रोतों में प्रदूषण बढ़ने से जलीय जीवों और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भूमि के अनुचित उपयोग और मिट्टी के क्षरण से कृषि उत्पादन की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
इसी प्रकार जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ता है, जो वैश्विक तापमान में वृद्धि का प्रमुख कारण है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को सीमित करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, सार्वजनिक परिवहन, वृक्ष संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा देना आवश्यक है।
हमें यह भी समझना होगा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार या पर्यावरणविदों की जिम्मेदारी नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। घर, विद्यालय, कार्यालय, बाजार, खेत और सार्वजनिक स्थलों पर किए जाने वाले छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े बदलाव का आधार बन सकते हैं।

यदि प्रत्येक व्यक्ति पानी की बर्बादी रोके, अनावश्यक बिजली का उपयोग कम करे, कचरे को अलग-अलग रखे, प्लास्टिक के उपयोग में कमी लाए और पौधे लगाने के साथ उनकी देखभाल भी करे, तो पर्यावरण संरक्षण के अभियान को व्यापक जनसमर्थन मिल सकता है।
प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग ही वह मार्ग है, जो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है।
धार्मिक आयोजनों को पर्यावरण संरक्षण का माध्यम बनाएं
भारत में दुर्गापूजा और नवरात्रि जैसे पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाए जाते हैं। इन अवसरों पर लाखों लोग पूजा पंडालों, मंदिरों और धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। ऐसे आयोजनों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाया जा सकता है।
पूजा समितियां अपने स्तर पर कई महत्वपूर्ण पहल कर सकती हैं। मूर्तियों के निर्माण में पर्यावरण के अनुकूल सामग्री को प्राथमिकता दी जा सकती है। सजावट में पुनः उपयोग योग्य वस्तुओं का प्रयोग बढ़ाया जा सकता है। पूजा पंडालों में एकल उपयोग वाले प्लास्टिक से बचा जा सकता है तथा पर्याप्त कूड़ेदान की व्यवस्था की जा सकती है।
ध्वनि विस्तारक यंत्रों का निर्धारित मानकों के अनुसार उपयोग, बिजली की बचत, जलस्रोतों की स्वच्छता और पूजा सामग्री के उचित निस्तारण पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। विसर्जन के दौरान स्थानीय प्रशासन के निर्देशों और पर्यावरण संबंधी नियमों का पालन करना आवश्यक है।

यदि प्रत्येक पूजा समिति यह संकल्प ले कि उसका आयोजन स्वच्छ, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल होगा, तो धार्मिक आस्था के साथ जनहित का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है।
विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिक समूहों को भी नवरात्रि के दौरान पौधरोपण, स्वच्छता अभियान, जल संरक्षण जागरूकता और जैव विविधता से संबंधित कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए। इन प्रयासों से नई पीढ़ी में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी।
इस प्रकार पर्व केवल उत्सव तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और पर्यावरणीय जागरूकता के प्रभावी माध्यम बन सकेंगे।
आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण छोड़ना हमारा दायित्व
हम अक्सर विकास, आर्थिक समृद्धि और आधुनिक सुविधाओं की चर्चा करते हैं, लेकिन यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी पृथ्वी छोड़कर जाएंगे।
क्या उन्हें स्वच्छ नदियां, हरे-भरे वन, उपजाऊ मिट्टी और शुद्ध वायु मिलेगी? क्या वे प्राकृतिक सौंदर्य और जैव विविधता का आनंद ले सकेंगे? क्या उन्हें पर्याप्त जल और सुरक्षित खाद्य संसाधन उपलब्ध होंगे?
इन प्रश्नों का उत्तर हमारे वर्तमान निर्णयों और कार्यों पर निर्भर करता है। पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल वर्तमान संकट को कम करना नहीं, बल्कि भविष्य के जीवन की संभावनाओं को सुरक्षित रखना भी है।
बच्चों को प्रारंभ से ही पेड़-पौधों की देखभाल, जल संरक्षण, स्वच्छता और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता का महत्व समझाया जाना चाहिए। परिवारों में पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाने की आदत विकसित करनी चाहिए। समाज को भी ऐसे विकास कार्यों का समर्थन करना चाहिए, जो प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करते हुए लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करें।

मेरा मानना है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए वैज्ञानिक सोच और सांस्कृतिक चेतना का समन्वय अत्यंत आवश्यक है। विज्ञान हमें पर्यावरणीय संकट के कारणों और समाधानों की जानकारी देता है, जबकि हमारी सांस्कृतिक परंपराएं प्रकृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव विकसित करने में सहायक हो सकती हैं।
जब ज्ञान, आस्था और व्यवहार एक दिशा में आगे बढ़ेंगे, तभी व्यापक और स्थायी परिवर्तन संभव होगा।
महानवमी पर लें प्रकृति संरक्षण का संकल्प
अंत में, महानवमी के इस पावन अवसर पर मैं अपने प्रिय देश भारत के सभी भाइयों, बहनों, माताओं, युवाओं और बच्चों से विनम्र निवेदन करता हूं कि मां दुर्गा की आराधना करते समय हम प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों को भी याद रखें।
आइए, हम सभी संकल्प लें कि—
1. हम प्रकृति का सम्मान करेंगे और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से बचने का प्रयास करेंगे।
2. जल की प्रत्येक बूंद का महत्व समझेंगे और पानी की बर्बादी रोकेंगे।
3. पेड़-पौधों की रक्षा करेंगे तथा पौधरोपण के साथ उनके संरक्षण और देखभाल को भी प्राथमिकता देंगे।
4. नदियों, तालाबों और अन्य जलस्रोतों को प्रदूषित नहीं करेंगे।
5. प्लास्टिक के अनावश्यक उपयोग को कम करेंगे और कचरे का उचित निस्तारण करेंगे।
6. ऊर्जा की बचत करेंगे तथा पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को अपनाएंगे।
7. वन्यजीवों, पक्षियों और समस्त जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशील रहेंगे।
8. प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग करेंगे, दुरुपयोग नहीं।
9. अपने परिवार, समाज और नई पीढ़ी को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाएंगे।
10. धार्मिक आस्था को स्वच्छता, सेवा, करुणा और प्रकृति की रक्षा जैसे व्यावहारिक कार्यों से जोड़ेंगे।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति का विनाश करके मानव जाति का वास्तविक कल्याण संभव नहीं है। पृथ्वी का पर्यावरण किसी एक व्यक्ति, समुदाय या देश की संपत्ति नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता और जीव-जगत की साझा धरोहर है। इसकी रक्षा करना हमारा नैतिक दायित्व है।
यदि हम सचमुच प्रकृति और शक्ति के स्वरूप मां दुर्गा की कृपा के आकांक्षी हैं, तो हमें उनकी सृष्टि की रक्षा के लिए अपने आचरण में परिवर्तन लाना होगा। मां की आराधना के साथ प्रकृति की सेवा, जल का संरक्षण, वृक्षों की रक्षा और पर्यावरण की स्वच्छता को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाना होगा।
याद रखें, प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी मानव सभ्यता सुरक्षित रहेगी। पर्यावरण संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
आइए, इस महानवमी पर भक्ति को कर्तव्य से, आस्था को आचरण से और पूजा को प्रकृति की सेवा से जोड़ने का संकल्प लें।
जय मां दुर्गा! जय मां काली! जय मां सिद्धिदात्री!
प्रकृति की रक्षा करें, पृथ्वी को सुरक्षित रखें और मानवता के उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त करें।







