दीपावली पर प्रकृति के नाम जलाएं एक दीया, पेड़-पौधों के संरक्षण का लें संकल्प : डॉ. श्याम नंदन प्रसाद ने दिया हरित दीपोत्सव का संदेश

Written by Sanjay Kumar

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पटना(अपना नालंदा)। प्रकृति हमारी सृष्टि का आधार है और इसका संरक्षण करना प्रत्येक मनुष्य का परम कर्तव्य है। प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जल, जंगल, जमीन, पेड़-पौधे, नदियां और वायु हमारे अस्तित्व के मूल आधार हैं। इसलिए इनका संरक्षण केवल पर्यावरणविदों या किसी विशेष संस्था की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव समाज का नैतिक एवं सामाजिक दायित्व है। दीपावली का पावन पर्व हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर तथा निराशा से आशा की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। ऐसे में इस वर्ष दीपोत्सव को एक नई पर्यावरणीय सोच के साथ मनाने की आवश्यकता है। क्यों न हम इस दीपावली पर एक दीया अपने जीवन के मूल आधार पेड़-पौधों के नाम भी जलाएं और प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करें?

दीपावली भारतीय संस्कृति, परंपरा, आस्था और आध्यात्मिक चेतना का महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व स्वच्छता, प्रकाश, सद्भावना, सकारात्मकता तथा बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। भारतीय परंपरा में दीप जलाने का विशेष महत्व है। मिट्टी के दीये की छोटी-सी लौ भी हमें यह संदेश देती है कि जीवन में कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न आएं, प्रकाश और सकारात्मकता का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए। लेकिन समय के साथ दीपावली मनाने के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है। आधुनिकता की दौड़ में हम कहीं न कहीं इस पवित्र पर्व के मूल भाव और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भूलते जा रहे हैं।

आज दीपावली का उत्सव कई स्थानों पर अत्यधिक आतिशबाजी, तेज ध्वनि, प्लास्टिक आधारित सजावट और कृत्रिम रोशनी की प्रतिस्पर्धा तक सीमित होता जा रहा है। इसका सीधा प्रभाव हमारे पर्यावरण, वायु की गुणवत्ता, ध्वनि स्तर तथा जीव-जंतुओं के प्राकृतिक जीवन पर पड़ता है। पटाखों से निकलने वाला धुआं और सूक्ष्म कण वातावरण को प्रदूषित करते हैं। तेज आवाज से बुजुर्गों, बच्चों, मरीजों और पशु-पक्षियों को परेशानी होती है। वहीं, प्लास्टिक और अन्य गैर-अपघटनीय सजावटी सामग्रियां कचरे की समस्या को बढ़ाती हैं। क्या यही दीपावली का वास्तविक उद्देश्य है? क्या प्रकाश के इस पर्व को मनाने के लिए प्रकृति को अंधकार और प्रदूषण की ओर धकेलना उचित है? इन प्रश्नों पर आज गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

मिट्टी के दीयों की परंपरा अपनाएं, प्रदूषण से बचाएं पर्यावरण

भारतीय संस्कृति में मिट्टी के दीये का अपना अलग ही महत्व है। मिट्टी से बने दीये न केवल हमारी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं, बल्कि स्थानीय कुम्हारों और छोटे कारीगरों की आजीविका का भी आधार हैं। सरसों के तेल या घी से जलने वाले पारंपरिक दीये की लौ हमारे घर-आंगन में सात्विकता और आत्मीयता का वातावरण बनाती है।

आज हम पारंपरिक मिट्टी के दीयों को छोड़कर अत्यधिक कृत्रिम सजावट और प्लास्टिक आधारित रोशनी की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि आधुनिक तकनीक ने हमारे जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसका उपयोग पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर होना चाहिए। हमें ऐसी परंपराओं को बढ़ावा देना चाहिए जो प्रकृति के अनुकूल हों। मिट्टी के दीये जलाकर हम अपनी संस्कृति को जीवित रखने के साथ-साथ स्थानीय कारीगरों को भी आर्थिक सहयोग दे सकते हैं।

दीपावली के दौरान पटाखों के अनावश्यक उपयोग से भी बचना चाहिए। उत्सव का आनंद दूसरों के स्वास्थ्य, शांति और पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए। वास्तविक उत्सव वही है, जिसमें मनुष्य के साथ-साथ प्रकृति के प्रत्येक जीव को भी सुरक्षित और सुखद वातावरण मिल सके।

पेड़-पौधे हैं हमारे जीवन का मूल आधार

एक वनस्पति शास्त्री एवं पादप पारिस्थितिकी के अध्येता होने के नाते मेरा स्पष्ट मानना है कि पेड़-पौधे पृथ्वी पर जीवन के सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। इनके बिना मानव सभ्यता का अस्तित्व संभव नहीं है। पेड़ हमें प्राणवायु उपलब्ध कराने, कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने, तापमान नियंत्रित करने, मिट्टी का कटाव रोकने और जलचक्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पेड़-पौधे केवल हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करते, बल्कि असंख्य जीव-जंतुओं और पक्षियों को आश्रय भी प्रदान करते हैं। जंगलों और हरित क्षेत्रों के कारण जैव विविधता सुरक्षित रहती है। वर्षा के प्राकृतिक चक्र को संतुलित बनाए रखने तथा भूजल संरक्षण में भी वनस्पतियों का महत्वपूर्ण योगदान है।

इसके बावजूद आज विकास और आधुनिकता के नाम पर पेड़ों की अनावश्यक कटाई की जा रही है। सड़कों, भवनों, बाजारों और अन्य निर्माण कार्यों के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों को हटाया जा रहा है। कई बार पौधारोपण के नाम पर अभियान तो चलाए जाते हैं, लेकिन लगाए गए पौधों की देखभाल नहीं की जाती। परिणामस्वरूप अधिकांश पौधे कुछ ही दिनों में सूख जाते हैं।

यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। केवल पौधे लगा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी नियमित देखभाल करना भी उतना ही आवश्यक है। हमें प्रत्येक पौधे को अपने परिवार के सदस्य की तरह समझना चाहिए। उसे समय पर पानी देना, उसकी सुरक्षा करना और उसके वृक्ष बनने तक देखभाल करना हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए। एक विकसित वृक्ष आने वाली कई पीढ़ियों को लाभ पहुंचाता है।

तुलसी, पीपल, बरगद और आंवला की पूजा में छिपा है प्रकृति संरक्षण का संदेश

भारतीय संस्कृति में प्रकृति को सदैव मातृस्वरूपा माना गया है। हमारे वेदों, उपनिषदों और प्राचीन धार्मिक परंपराओं में पृथ्वी को धरा माता, नदियों को जीवनदायिनी मां और प्रकृति को जीवन का आधार माना गया है। भारतीय समाज में वृक्षों और वनस्पतियों की पूजा की परंपरा भी इसी प्राकृतिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

तुलसी, पीपल, बरगद और आंवला जैसे पौधों एवं वृक्षों को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष स्थान प्राप्त है। इनके संरक्षण के पीछे पारिस्थितिक महत्व भी जुड़ा हुआ है।

तुलसी का पौधा भारतीय घरों में विशेष श्रद्धा के साथ लगाया जाता है। इसमें औषधीय गुण पाए जाते हैं और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। तुलसी की पूजा के माध्यम से घरों में पौधों के प्रति सम्मान और उनकी देखभाल की भावना विकसित होती है।

पीपल का वृक्ष विशाल छाया प्रदान करता है और अनेक पक्षियों तथा जीव-जंतुओं का आश्रय स्थल बनता है। यह शहरी एवं ग्रामीण पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

बरगद का वृक्ष अपनी विशाल शाखाओं और विस्तृत छत्र के कारण अनेक जीवों को आश्रय प्रदान करता है। इसकी लंबी आयु और विशाल स्वरूप इसे प्राकृतिक विरासत का प्रतीक बनाते हैं।

आंवले का वृक्ष पोषण एवं औषधीय महत्व के लिए जाना जाता है। इसके फल में विटामिन-सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह भी हमारी पारंपरिक वनस्पति विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इन वृक्षों और पौधों के प्रति हमारी धार्मिक आस्था को यदि पर्यावरण संरक्षण की व्यावहारिक पहल से जोड़ दिया जाए, तो समाज में हरित चेतना का व्यापक प्रसार हो सकता है।

क्यों जलाते हैं तुलसी के समीप संध्याकाल में दीप?

हमारे घरों में तुलसी के पौधे के समीप संध्याकाल में दीप जलाने की प्राचीन परंपरा रही है। यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, श्रद्धा और जुड़ाव का प्रतीक भी है। तुलसी के पौधे को घर में स्थान देकर उसकी नियमित देखभाल की जाती है। इस प्रकार धार्मिक आस्था पौधों के संरक्षण की सामाजिक परंपरा को मजबूत करती है।

यदि हम इस परंपरा के वास्तविक भाव को समझें, तो आज के पर्यावरणीय संकट के दौर में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। हमें अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर आगे बढ़ाना चाहिए। इससे नई पीढ़ी में भी प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित होगी।

इस दीपावली का संकल्प : एक दीया पेड़-पौधों के नाम

आइए, इस दीपावली हम एक नई और सार्थक पहल की शुरुआत करें। जिस प्रकार हम अपने घरों में मां लक्ष्मी और विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करते हैं, उसी प्रकार प्रकृति के प्रति भी अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें।

इस वर्ष दीपोत्सव के अवसर पर ‘एक दीया हमारे जीने का मूल आधार पेड़-पौधों के नाम’ अभियान को अपनाने का संकल्प लें।

* अपने घर में तुलसी के पौधे के समीप एक दीया जलाएं।

* आसपास उपलब्ध पीपल, बरगद और आंवले जैसे वृक्षों के संरक्षण का संकल्प लें।

* पेड़ों के आसपास स्वच्छता बनाए रखें और उन्हें नुकसान न पहुंचाएं।

* परिवार के प्रत्येक सदस्य के नाम पर कम से कम एक पौधा लगाएं।

* लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल करें और उन्हें वृक्ष बनने तक सुरक्षित रखें।

* पटाखों के अनावश्यक उपयोग से बचें तथा ध्वनि और वायु प्रदूषण को कम करने में सहयोग करें।

* प्लास्टिक की सजावट के स्थान पर मिट्टी, कागज और अन्य पर्यावरण अनुकूल सामग्रियों का उपयोग करें।

* बच्चों को पेड़-पौधों, वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व के बारे में जागरूक करें।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि पेड़ों के समीप दीप जलाते समय आग से सुरक्षा का पूरा ध्यान रखें। सूखी पत्तियों, घास और ज्वलनशील पदार्थों से दूर सुरक्षित स्थान पर दीप रखें, ताकि किसी प्रकार की दुर्घटना न हो और पेड़ों को भी नुकसान न पहुंचे।

पर्यावरण संरक्षण ही आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की गारंटी

आज पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, वायु प्रदूषण, जल संकट और जैव विविधता के क्षरण जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। इन समस्याओं का प्रभाव केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, वनों की कटाई और पर्यावरण के प्रति बढ़ती लापरवाही मानव अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। ऐसे समय में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। सरकार और प्रशासन के प्रयास तभी सफल होंगे, जब आम नागरिक भी पर्यावरण संरक्षण को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएंगे।

हमें यह समझना होगा कि प्रकृति से हमें बहुत कुछ मिलता है, लेकिन प्रकृति को वापस देने के लिए हम क्या कर रहे हैं? केवल एक दिन पौधारोपण करना या पर्यावरण दिवस पर संदेश देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक बदलाव तभी आएगा, जब हम अपने व्यवहार में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी को शामिल करेंगे।

भारतीय संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का अटूट संबंध

हमारे प्राचीन ग्रंथों में प्रकृति के प्रति सम्मान और उसके संरक्षण का संदेश विभिन्न रूपों में मिलता है। भारतीय संस्कृति में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश को पंचमहाभूत माना गया है। मानव शरीर और संपूर्ण सृष्टि का अस्तित्व इन्हीं प्राकृतिक तत्वों के संतुलन पर निर्भर है।

हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व भी प्रकृति से गहरे जुड़े हुए हैं। मकर संक्रांति, छठ पूजा, वट सावित्री, तुलसी विवाह और दीपावली जैसे पर्वों में प्रकृति, सूर्य, जल, वृक्ष और वनस्पतियों के प्रति श्रद्धा का भाव दिखाई देता है।

इसलिए आधुनिक जीवनशैली अपनाते समय हमें अपनी उन परंपराओं को नहीं भूलना चाहिए, जिनमें प्रकृति के संरक्षण का संदेश निहित है। हमारी सांस्कृतिक विरासत तभी सार्थक होगी, जब हम उसके मूल भाव को अपने आचरण में उतारेंगे।

‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ को जीवन में आत्मसात करें

उपनिषदों का प्रसिद्ध संदेश है- ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’, अर्थात हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। इस संदेश को केवल धार्मिक या आध्यात्मिक अर्थों में ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी समझने की आवश्यकता है।

अज्ञान और लापरवाही का अंधकार तभी दूर होगा, जब हम प्रकृति के महत्व को समझेंगे। प्रदूषण और पर्यावरण विनाश की प्रवृत्ति से बाहर निकलकर हरित एवं स्वच्छ जीवनशैली अपनाएंगे। दीपावली का वास्तविक प्रकाश तभी सार्थक होगा, जब हमारे घरों के साथ-साथ हमारी धरती भी स्वच्छ, सुंदर और हरी-भरी बनेगी।

मां लक्ष्मी और विघ्नहर्ता भगवान गणेश की आराधना करते समय हमें यह प्रार्थना भी करनी चाहिए कि संपूर्ण मानव जाति सहित पृथ्वी पर निवास करने वाले सभी जीव-जंतुओं को पर्यावरणीय संकट से मुक्ति मिले। प्रकृति का संतुलन बना रहे, नदियां स्वच्छ रहें, वन सुरक्षित रहें और आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ एवं सुंदर वातावरण प्राप्त हो।

आइए, हरित दीपावली मनाने का संकल्प लें

मैं समस्त देशवासियों से हृदय से अपील करता हूं कि इस दीपावली को केवल रोशनी और उत्सव का पर्व न बनाएं, बल्कि इसे प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर भी बनाएं। मिट्टी के दीयों की परंपरा को अपनाएं, प्रदूषण से बचें, पेड़-पौधों का संरक्षण करें और प्रत्येक परिवार को कम से कम एक पौधा लगाने एवं उसकी नियमित देखभाल करने के लिए प्रेरित करें।

याद रखिए, एक दीया घर को रोशन करता है, लेकिन एक पेड़ कई पीढ़ियों के जीवन को सुरक्षित रखने में योगदान देता है। जिस धरती ने हमें जीवन दिया है, उसकी रक्षा करना हमारा सबसे बड़ा धर्म और कर्तव्य है।

आइए, इस दीपावली एक नई परंपरा की शुरुआत करें। मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की आराधना के साथ प्रकृति माता के प्रति भी अपनी श्रद्धा प्रकट करें। पीपल, बरगद, आंवला और तुलसी के नाम एक दीया जलाएं तथा हरित एवं स्वच्छ पर्यावरण के निर्माण का संकल्प लें।

इसी में मानवता का कल्याण है, इसी में आने वाली पीढ़ियों का सुरक्षित भविष्य है और इसी में सच्चे दीपोत्सव की सार्थकता निहित है।

समस्त देशवासियों को दीपावली की अग्रिम हरित बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं।

प्रकृति द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग आपके जीवन में खुशहाली, प्रगति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करे। देवों के देव महादेव, जगत के पालनहार भगवान विष्णु, मां धान्यलक्ष्मी और विघ्नहर्ता भगवान गणेश से मेरी यही मंगलकामना है कि सभी के जीवन में सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रकाश फैले तथा हमारी धरती सदैव हरी-भरी और जीवनदायिनी बनी रहे।

विशेष संदेश :

एक दीया प्रकृति के नाम,

एक पेड़ आने वाली पीढ़ियों के नाम।

प्रकृति बचेगी, तभी मानव सभ्यता बचेगी।

— डॉ. श्याम नंदन प्रसाद पीएच.डी. (पादप पारिस्थितिकी) पूर्व प्राचार्य एवं पर्यावरणविद्, पटना, बिहार।

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