जल संकट की बढ़ती चुनौती: क्या पानी बनेगा भविष्य के वैश्विक संघर्ष का कारण?

Written by Sanjay Kumar

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आलेख : प्रो. श्याम नंदन प्रसाद
पूर्व प्राचार्य एवं पर्यावरणविद्
मुख्य समन्वयक, वनस्पति शास्त्र विभाग, नालंदा खुला विश्वविद्यालय, नालंदा, बिहार

जल ही जीवन है, इसे समझने का समय अब आ चुका है

“जल ही जीवन है”—यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व की सबसे बुनियादी सच्चाई है। पृथ्वी पर जीवन की कल्पना पानी के बिना नहीं की जा सकती। मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जल पर निर्भर हैं। हमारे शरीर की अधिकांश जैव-रासायनिक एवं शारीरिक क्रियाएं पानी की उपस्थिति में ही संचालित होती हैं। इसलिए पानी की एक-एक बूंद का महत्व समझना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।

पेड़-पौधों का अस्तित्व भी जल पर निर्भर है। वनस्पतियां वातावरण में ऑक्सीजन, कार्बन चक्र, वर्षा चक्र और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यदि जल संकट गहराता है तो इसका सीधा असर वनस्पतियों और कृषि पर पड़ेगा और अंततः इसका प्रभाव मानव जीवन पर पड़ेगा।

इसलिए अब समय आ गया है कि हम पानी के उपयोग के प्रति अपनी सोच और व्यवहार दोनों में बदलाव लाएं। पानी का अनावश्यक दोहन और बर्बादी रोकना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

क्या पानी भविष्य के संघर्षों का कारण बन सकता है?

कई दशकों से वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों द्वारा यह आशंका व्यक्त की जाती रही है कि भविष्य में पानी को लेकर देशों और क्षेत्रों के बीच गंभीर तनाव पैदा हो सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी तथा विश्व बैंक के पूर्व उपाध्यक्ष इस्माइल सेरागेलडिन जैसे विचारकों से जुड़ा यह कथन व्यापक रूप से उद्धृत किया जाता रहा है कि 20वीं सदी में यदि संघर्ष तेल को लेकर हुए, तो 21वीं सदी में पानी को लेकर संघर्ष की आशंका बढ़ सकती है।

इस कथन को केवल भविष्यवाणी के रूप में देखने के बजाय एक चेतावनी के रूप में समझने की आवश्यकता है। विश्व के अनेक हिस्सों में नदियों, भूजल और जलाशयों के बंटवारे को लेकर देशों एवं क्षेत्रों के बीच मतभेद पहले से मौजूद हैं। ऐसी परिस्थितियों में यदि जल संकट और बढ़ता है, तो पानी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तनाव का महत्वपूर्ण कारण बन सकता है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि निश्चित रूप से तीसरा विश्व युद्ध पानी के कारण ही होगा। लेकिन जल संकट से पैदा होने वाले क्षेत्रीय विवाद, विस्थापन, खाद्य संकट और सामाजिक तनाव भविष्य में अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता को बढ़ा सकते हैं। इसलिए इस खतरे को गंभीरता से समझना जरूरी है।

मीठे पानी की सीमित उपलब्धता बड़ी चुनौती

पृथ्वी पर पानी की मात्रा बहुत अधिक दिखाई देती है, लेकिन इसका अधिकांश हिस्सा समुद्रों में मौजूद खारा पानी है। मानव उपयोग के लिए उपलब्ध मीठे पानी का हिस्सा बहुत सीमित है। उपलब्ध मीठे पानी का बड़ा हिस्सा हिमनदों और बर्फ के रूप में जमा है, जबकि नदियों, झीलों और भूजल के रूप में उपलब्ध हिस्सा अपेक्षाकृत कम है।

यही कारण है कि बढ़ती आबादी, शहरीकरण, औद्योगीकरण और कृषि में पानी की बढ़ती मांग के बीच जल संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।

कई बड़ी नदियां एक से अधिक देशों से होकर गुजरती हैं। ऐसी अंतरराष्ट्रीय नदियों के पानी का उपयोग, बांध निर्माण और जल प्रवाह को लेकर देशों के बीच मतभेद पैदा होते रहे हैं। यदि इन विवादों का समाधान सहयोग और बातचीत के माध्यम से नहीं किया गया, तो भविष्य में ये तनाव का बड़ा कारण बन सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता

जल संकट को समझने के लिए जलवायु परिवर्तन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वैश्विक तापमान में वृद्धि का असर हिमनदों, वर्षा के स्वरूप और जलचक्र पर पड़ रहा है। कई क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं, तो दूसरी ओर कई स्थानों पर लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति देखने को मिल रही है।

वर्षा के असमान वितरण का सीधा प्रभाव कृषि, पेयजल और भूजल पर पड़ता है। जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है, वहां भूजल पर निर्भरता बढ़ती है। दूसरी ओर अत्यधिक वर्षा होने पर पानी का बड़ा हिस्सा बहकर निकल जाता है और उसका पर्याप्त संचयन नहीं हो पाता।

इसलिए केवल अधिक बारिश होना पर्याप्त नहीं है। वर्षा जल का संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और जल स्रोतों का वैज्ञानिक प्रबंधन भी उतना ही आवश्यक है।

जनसंख्या वृद्धि और जल की बढ़ती मांग

दुनिया की बढ़ती आबादी जल संकट को और गंभीर बना रही है। आबादी बढ़ने के साथ पेयजल, कृषि, उद्योग और ऊर्जा उत्पादन के लिए पानी की मांग भी बढ़ती है।

कृषि क्षेत्र में सिंचाई के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। वहीं तेजी से फैलते शहरों में घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग के कारण जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

यदि आज जल संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में पानी की उपलब्धता को लेकर सामाजिक असमानता बढ़ सकती है। अमीर और गरीब वर्ग के बीच जल उपलब्धता का अंतर भी गंभीर सामाजिक समस्या बन सकता है।

जल संकट और खाद्य सुरक्षा का संबंध

पानी की कमी केवल पीने के पानी की समस्या नहीं है। इसका सीधा संबंध खाद्य सुरक्षा से भी है। कृषि उत्पादन के लिए पर्याप्त पानी आवश्यक है। यदि सिंचाई के साधनों और वर्षा जल की उपलब्धता में कमी आती है तो फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

फसल उत्पादन घटने से खाद्यान्न की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके परिणामस्वरूप गरीब और कमजोर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। जल संकट इसलिए आर्थिक संकट और खाद्य संकट का रूप भी ले सकता है।

भारत के लिए भी महत्वपूर्ण चेतावनी

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए जल संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा और जल उपलब्धता में काफी अंतर है। कहीं बाढ़ आती है तो कहीं सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।

भूजल का अत्यधिक दोहन भी चिंता का विषय है। कई शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार नीचे जाने की समस्या सामने आती रही है। ऐसे में वर्षा जल संचयन, तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण, नदियों एवं जलाशयों की सफाई तथा भूजल पुनर्भरण को प्राथमिकता देनी होगी।

समाधान युद्ध नहीं, सहयोग है

यदि पानी भविष्य में संघर्ष का कारण बन सकता है तो इसका समाधान भी संघर्ष नहीं, बल्कि सहयोग होना चाहिए। देशों के बीच साझा नदियों के पानी को लेकर पारदर्शी समझौते, वैज्ञानिक जल प्रबंधन और नियमित संवाद आवश्यक हैं।

स्थानीय स्तर पर भी पंचायतों, नगर निकायों, किसानों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों को मिलकर जल संरक्षण की व्यवस्था विकसित करनी होगी।

वर्षा जल संचयन को व्यापक स्तर पर अपनाना, खेतों में पानी की बचत करने वाली तकनीकों का उपयोग, घरों में पानी की बर्बादी रोकना और पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना ऐसे उपाय हैं जिनसे जल संकट को कम किया जा सकता है।

नई पीढ़ी को जल संरक्षण का संस्कार देना होगा

जल संरक्षण केवल योजनाओं और कानूनों से संभव नहीं होगा। इसके लिए सामाजिक चेतना आवश्यक है। बच्चों और युवाओं को स्कूल स्तर से ही जल के महत्व और संरक्षण के तरीकों के बारे में शिक्षित करना होगा।

हमें यह समझना होगा कि नल से आने वाला पानी किसी असीमित स्रोत से नहीं आता। इसके पीछे वर्षा, नदियां, तालाब, जलाशय, भूजल और पूरा प्राकृतिक जलचक्र काम करता है।

यदि हम आज पानी की बर्बादी रोकते हैं, तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य तैयार करते हैं।

निष्कर्ष

“तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा”—इस कथन को निश्चित भविष्यवाणी मानने के बजाय एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखना अधिक उचित होगा। दुनिया के सामने जल संकट की चुनौती वास्तविक है और जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि, अनियोजित शहरीकरण तथा जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है।

युद्ध और संघर्ष मानव सभ्यता को विनाश की ओर ले जा सकते हैं। इतिहास में युद्धों की भयावहता और परमाणु हथियारों की विनाशकारी क्षमता पूरी दुनिया देख चुकी है। इसलिए यह आवश्यक है कि पानी को संघर्ष का कारण बनने देने के बजाय शांति और सहयोग का माध्यम बनाया जाए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम “जल ही जीवन है” को केवल भाषणों और नारों तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने दैनिक जीवन का व्यवहार बनाएं।

पानी की हर बूंद भविष्य की अमानत है। यदि आज हमने जल का संरक्षण किया, तभी आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन, पर्यावरण और सभ्यता को सुरक्षित रखा जा सकेगा।

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