श्रीकृष्ण के जीवन में छिपा है पर्यावरण संरक्षण का गहरा संदेश

Written by Sanjay Kumar

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आलेख

प्रो. श्याम नंदन प्रसाद

पूर्व प्राचार्य एवं पर्यावरणविद्

मुख्य समन्वयक, वनस्पति शास्त्र विभाग

नालंदा खुला विश्वविद्यालय, नालंदा, बिहार, भारत

प्रो. नंदीपति तिवारी

जंतु विशेषज्ञ

मुख्य समन्वयक, जंतु शास्त्र विभाग

नालंदा खुला विश्वविद्यालय, नालंदा, बिहार, भारत

प्रो. अनिल कुमार

प्राचार्य, पटना कॉलेज

पटना विश्वविद्यालय, पटना, बिहार

श्रीकृष्ण और प्रकृति का अद्भुत संबंध

जगत के तारणहार, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के जीवन को यदि बाल्यकाल से लेकर उनके जीवन के अंतिम क्षणों तक गहराई से देखा और समझा जाए तो उनकी अनेक लीलाओं एवं गतिविधियों में प्रकृति, पर्यावरण, वनस्पतियों, नदियों, पर्वतों तथा जीव-जंतुओं के प्रति गहरा लगाव और संरक्षण का संदेश दिखाई देता है।

भगवान श्रीकृष्ण को भारतीय संस्कृति में लीलाधर, योगेश्वर, पुनरुद्धारक और जगद्गुरु के रूप में देखा जाता है। उनका जीवन केवल आध्यात्मिक एवं धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी अत्यंत प्रेरणादायक है।

श्रीकृष्ण का बाल्यकाल यमुना नदी के तटों, गोकुल की हरियाली, वृंदावन के वन क्षेत्रों और प्राकृतिक वातावरण के बीच बीता। उनके जीवन की अनेक लीलाएं प्रकृति की गोद में हुईं। यही कारण है कि श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में हमें प्रकृति के साथ मनुष्य के सह-अस्तित्व की सुंदर तस्वीर दिखाई देती है।

गोवर्धन पूजा में प्रकृति संरक्षण का संदेश

श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गोवर्धन पर्वत की पूजा का प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत के महत्व को समझाते हुए लोगों को प्रकृति एवं स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का संदेश दिया।

गोवर्धन केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि वहां के लोगों के जीवन का आधार था। पर्वत से जल, वनस्पति, चारा और अन्य प्राकृतिक संसाधन प्राप्त होते थे। पशुधन के लिए हरी घास और मनुष्यों के लिए अनेक आवश्यक संसाधन प्रकृति से ही मिलते थे।

गोवर्धन पूजा का व्यापक संदेश यही है कि प्रकृति हमें जीवन प्रदान करती है, इसलिए प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और उसकी रक्षा हमारा दायित्व होना चाहिए।

लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व की इस कथा को यदि आधुनिक पर्यावरण विज्ञान के दृष्टिकोण से देखें तो इसमें प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और उनके विवेकपूर्ण उपयोग का महत्वपूर्ण संदेश दिखाई देता है।

आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, जंगलों की कटाई, जल संकट, प्रदूषण और जैव विविधता के ह्रास जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है, तब गोवर्धन पूजा का यह संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।

यमुना नदी और जल संरक्षण की प्रेरणा

श्रीकृष्ण का जीवन यमुना नदी से भी गहराई से जुड़ा रहा है। यमुना के तट पर उनकी अनेक बाल लीलाओं का वर्णन मिलता है। इससे हमें नदियों और जल स्रोतों के महत्व को समझने की प्रेरणा मिलती है।

भारतीय सभ्यता में नदियों को केवल जल की धारा नहीं माना गया, बल्कि उन्हें जीवनदायिनी शक्ति के रूप में सम्मान दिया गया है। आज नदियां प्रदूषण, अतिक्रमण, औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक और अन्य मानवीय गतिविधियों के कारण गंभीर संकट का सामना कर रही हैं।

ऐसे समय में श्रीकृष्ण से जुड़ी यमुना की स्मृति हमें यह संदेश देती है कि जल स्रोतों की रक्षा करना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

‘जल ही जीवन है’—यह केवल एक नारा नहीं बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व की सच्चाई है। जन्माष्टमी जैसे पर्वों पर हमें धार्मिक अनुष्ठानों के साथ जल के विवेकपूर्ण उपयोग का भी संकल्प लेना चाहिए।

गाय, मोर और जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम

श्रीकृष्ण का जीव-जंतुओं से गहरा लगाव भारतीय जनमानस में सदियों से स्थापित है। उन्हें गोपाल और गोविंद के रूप में भी स्मरण किया जाता है। उनका जीवन गायों और ग्रामीण पशुधन के साथ जुड़ा रहा।

श्रीकृष्ण के मुकुट में मोर पंख का विशेष स्थान है। यह केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव-जगत के प्रति उनके प्रेम का भी सुंदर प्रतीक माना जा सकता है।

श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में वन, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, नदी और पर्वत बार-बार दिखाई देते हैं। इससे यह संदेश मिलता है कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है, बल्कि प्रकृति का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आज जैव विविधता के संरक्षण की आवश्यकता पूरे विश्व में महसूस की जा रही है। अनेक पशु-पक्षियों और वनस्पतियों की प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से प्रेरणा लेते हुए हमें सभी जीव-जंतुओं के प्रति दया, करुणा और संवेदनशीलता का भाव विकसित करना चाहिए।

वृंदावन के वन और जैव विविधता

श्रीकृष्ण की लीलाओं का एक बड़ा हिस्सा वृंदावन और उसके आसपास के प्राकृतिक क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है। वृंदावन के वन केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे जैव विविधता के महत्वपूर्ण आश्रय स्थल भी रहे होंगे।

वन मानव जीवन के लिए ऑक्सीजन, जल संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता, औषधीय वनस्पतियां और अनेक प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराते हैं। वन पशु-पक्षियों के प्राकृतिक आवास भी हैं।

आज विकास के नाम पर वनों का लगातार क्षरण हो रहा है। इसके कारण वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहा है। इसलिए श्रीकृष्ण की वन-संस्कृति से प्रेरणा लेते हुए हमें वनों के संरक्षण और वृक्षारोपण को जनआंदोलन बनाने की आवश्यकता है।

भारतीय संस्कृति में पर्यावरण चेतना

भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण कोई आधुनिक विचार नहीं है। हमारे प्राचीन ग्रंथों और परंपराओं में प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना गहराई से दिखाई देती है।

पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और धरती को सम्मान देने की परंपरा भारतीय जीवन पद्धति का हिस्सा रही है। हमारे अनेक पर्व और धार्मिक अनुष्ठान प्रकृति से जुड़े हुए हैं।

श्रीकृष्ण का जीवन भी इसी प्रकृति-केंद्रित भारतीय जीवन दृष्टि का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है।

हमारे शास्त्रों में वर्णित अनेक प्रसंगों के पीछे सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण संदेश छिपे हुए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम इन संदेशों को आधुनिक संदर्भ में समझें और अपने व्यवहार में उतारें।

संविधान भी देता है पर्यावरण संरक्षण का संदेश

भारत के संविधान में भी पर्यावरण संरक्षण को नागरिकों के कर्तव्यों से जोड़ा गया है। अनुच्छेद 51A(g) के तहत प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य बताया गया है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें वन, झील, नदी और वन्यजीव शामिल हैं, की रक्षा एवं सुधार करे तथा सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया भाव रखे।

यह संवैधानिक प्रावधान आज के दौर में विशेष महत्व रखता है। पर्यावरण संरक्षण केवल किसी एक व्यक्ति, संस्था या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। प्रत्येक नागरिक को अपने स्तर पर पर्यावरण संरक्षण में योगदान देना होगा।

यदि हम श्रीकृष्ण के जीवन से प्रकृति के प्रति प्रेम और संवेदनशीलता की प्रेरणा लेते हैं और उसे संविधान में निहित अपने मौलिक कर्तव्यों के साथ जोड़ते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक मजबूत सामाजिक चेतना विकसित की जा सकती है।

आज पर्यावरण संकट गंभीर चुनौती

आज पूरी दुनिया पर्यावरण संकट की गंभीर चुनौती का सामना कर रही है। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, मौसम का स्वरूप बदल रहा है, जल संकट बढ़ रहा है, जंगलों का क्षेत्र कम हो रहा है और प्रदूषण मानव स्वास्थ्य एवं जैव विविधता को प्रभावित कर रहा है।

प्लास्टिक प्रदूषण भी एक गंभीर समस्या बन चुका है। नदियों, तालाबों और समुद्रों तक प्लास्टिक पहुंच रहा है। इससे जलीय जीवों और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान हो रहा है।

यदि पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता है तो इसका सीधा असर मानव जीवन पर पड़ेगा। इसलिए अब समय केवल पर्यावरण पर चर्चा करने का नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर व्यवहार परिवर्तन करने का है।

जन्माष्टमी को बनाएं पर्यावरण-अनुकूल पर्व

भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के अवसर पर यदि हम उनके जीवन से प्रकृति प्रेम की प्रेरणा लेते हैं तो जन्माष्टमी को पर्यावरण-अनुकूल तरीके से मनाना सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।

1. प्लास्टिक को कहें ‘ना’

जन्माष्टमी के अवसर पर प्लास्टिक और पॉलीथीन बैग का प्रयोग नहीं करें। इसके स्थान पर कपड़े या कागज के थैलों का इस्तेमाल करें।

SAY “NO” TO PLASTIC

2. प्राकृतिक सामग्री से सजाएं मंदिर और झांकियां

मंदिरों और झांकियों की सजावट में थर्मोकोल तथा प्लास्टिक से निर्मित सजावटी वस्तुओं का प्रयोग कम से कम करें। इसके स्थान पर प्राकृतिक फूल, पत्तियां, मिट्टी से बनी वस्तुएं तथा अन्य पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का प्रयोग किया जा सकता है।

3. जल का विवेकपूर्ण उपयोग करें

अभिषेक और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में जल का अनावश्यक अपव्यय नहीं करें। जल की प्रत्येक बूंद महत्वपूर्ण है। हमें धार्मिक आस्था के साथ जल संरक्षण का भी संदेश देना चाहिए।

4. एक पेड़ अवश्य लगाएं

इस जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण को साक्षी मानकर कम से कम एक पौधा लगाएं। केवल पौधा लगाना ही पर्याप्त नहीं है। उसकी नियमित देखभाल करें, उसे पानी दें और तब तक संरक्षण करें जब तक वह बड़ा होकर पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान देने योग्य न हो जाए।

5. जीव-जंतुओं के प्रति दया रखें

पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता रखें। गर्मी, बारिश और बदलते मौसम में पक्षियों के लिए पानी एवं दाना रखने जैसी छोटी-छोटी पहल भी पर्यावरणीय संवेदनशीलता का प्रतीक हो सकती है।

जन्माष्टमी बने प्रकृति संरक्षण का संकल्प पर्व

भगवान श्रीकृष्ण का जीवन हमें यह सिखाता है कि मनुष्य का प्रकृति के साथ संबंध संघर्ष का नहीं बल्कि सह-अस्तित्व का होना चाहिए। प्रकृति हमारी आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन हमारी लालच को नहीं।

इस जन्माष्टमी पर यदि प्रत्येक परिवार एक पौधा लगाए, प्लास्टिक के उपयोग को कम करे, पानी बचाए, जीव-जंतुओं के प्रति दया का भाव रखे और अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखे तो यह भगवान श्रीकृष्ण के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी।

आज आवश्यकता है कि हम धार्मिक पर्वों को केवल पूजा-पाठ और उत्सव तक सीमित न रखें, बल्कि उनसे जुड़े सामाजिक और पर्यावरणीय संदेशों को भी जन-जन तक पहुंचाएं।

श्रीकृष्ण के गोवर्धन से हमें प्रकृति संरक्षण, यमुना से जल संरक्षण, वृंदावन से वन संरक्षण और गाय-मोर सहित जीव-जंतुओं के प्रति उनके प्रेम से जैव विविधता संरक्षण की प्रेरणा मिलती है।

आइए, इस जन्माष्टमी पर हम भगवान श्रीकृष्ण को साक्षी मानकर संकल्प लें कि हम प्रकृति की रक्षा करेंगे, जल बचाएंगे, पेड़ लगाएंगे, प्लास्टिक का उपयोग कम करेंगे और सभी जीवों के प्रति करुणा एवं दया का भाव रखेंगे।

यही श्रीकृष्ण के पर्यावरणीय दृष्टिकोण को आत्मसात करने की दिशा में हमारा सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा।

जन्माष्टमी की पूर्व संध्या पर हमारी ओर से समस्त देशवासियों को हार्दिक बधाई एवं ढेरों शुभकामनाएं।

“प्रकृति की रक्षा ही मानव जीवन की सुरक्षा है।

आइए, श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर प्रकृति संरक्षण का संकल्प लें।”

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