एक समीक्षात्मक एवं जनजागरूकतापरक मूल्यांकन
आलेख:
प्रो. श्याम नंदन प्रसाद, पूर्व प्राचार्य एवं पर्यावरणविद्
मुख्य समन्वयक, वनस्पति शास्त्र विभाग, नालंदा खुला विश्वविद्यालय, नालंदा, बिहार
प्रो. नंदीपति तिवारी, जंतु विशेषज्ञ
मुख्य समन्वयक, जंतु शास्त्र विभाग, नालंदा खुला विश्वविद्यालय, नालंदा, बिहार
प्रो. अनिल कुमार, प्राचार्य
पटना कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय, पटना, बिहार
शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर विशेष प्रस्तुति
भारत में प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को महान शिक्षाविद्, दार्शनिक एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती शिक्षक दिवस के रूप में मनाई जाती है। डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षा और शिक्षक के महत्व को सदैव सर्वोच्च स्थान दिया। उनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाना भारतीय समाज में शिक्षक की भूमिका और प्रतिष्ठा का प्रतीक है। वहीं, वैश्विक स्तर पर शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर को मनाया जाता है।
शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शक, संस्कारदाता और भविष्य निर्माता होता है। वह विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण के साथ-साथ समाज को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आज जब पूरी दुनिया गंभीर पर्यावरणीय संकट से गुजर रही है, तब शिक्षक की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति नई पीढ़ी को जागरूक करने में शिक्षक सबसे प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
पर्यावरण संकट आज मानव अस्तित्व के लिए चुनौती
आज पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीनहाउस प्रभाव, जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और प्लास्टिक प्रदूषण जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, बाढ़, सूखा, अत्यधिक गर्मी, जलस्रोतों का प्रदूषण और जैव विविधता का लगातार कम होना मानव सभ्यता के लिए गंभीर चेतावनी है।
इन समस्याओं के पीछे मानवीय गतिविधियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, जंगलों की कटाई, औद्योगिक प्रदूषण, वाहनों से निकलने वाला धुआं, प्लास्टिक का बढ़ता इस्तेमाल और कचरे का अनुचित प्रबंधन पर्यावरणीय असंतुलन को बढ़ा रहे हैं।
अब समय आ गया है कि हम अपनी जीवनशैली और अपनी गलतियों पर गंभीरता से विचार करें। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। सरकार कानून और योजनाएं बना सकती है, लेकिन पर्यावरण के प्रति व्यवहार में स्थायी बदलाव समाज की सामूहिक भागीदारी से ही संभव है।
शिक्षक पर्यावरणीय चेतना के सबसे प्रभावी वाहक
किसी भी समाज में शिक्षक ऐसा वर्ग है, जो बच्चों के मन और विचारों को सकारात्मक दिशा देने की क्षमता रखता है। बच्चे अपने शिक्षकों से केवल विषय का ज्ञान ही नहीं लेते, बल्कि व्यवहार, अनुशासन, संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारियों की सीख भी प्राप्त करते हैं।
यदि शिक्षक विद्यार्थियों में बचपन से ही प्रकृति के प्रति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण की भावना विकसित करें, तो इसका प्रभाव उनके पूरे जीवन पर पड़ सकता है। आज का बच्चा ही कल का नागरिक, वैज्ञानिक, चिकित्सक, इंजीनियर, प्रशासक, किसान, जनप्रतिनिधि और नीति निर्माता बनेगा। इसलिए उसके भीतर पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भविष्य के लिए सबसे बड़ा निवेश है।
बचपन से विकसित हो प्रकृति प्रेम
बच्चों को पेड़-पौधों, नदियों, तालाबों, पहाड़ों, जंगलों और जीव-जंतुओं के महत्व के बारे में सरल भाषा में जानकारी दी जानी चाहिए। उन्हें बताया जाना चाहिए कि प्रकृति केवल हमारे उपयोग की वस्तु नहीं है, बल्कि हमारे अस्तित्व का आधार है।
विद्यालयों में बच्चों को पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। केवल पौधारोपण की औपचारिकता पूरी करने के बजाय प्रत्येक बच्चे को एक पौधे की जिम्मेदारी दी जाए। वह पौधा जब धीरे-धीरे बड़ा होगा और बच्चा स्वयं उसकी वृद्धि देखेगा, तो उसके भीतर प्रकृति के प्रति भावनात्मक जुड़ाव पैदा होगा। यही जुड़ाव भविष्य में उसे पर्यावरण का प्रहरी बना सकता है।
‘जल ही जीवन है’ का संदेश जरूरी
जल के महत्व को बच्चों के मन में बचपन से ही स्थापित करना आवश्यक है। ‘जल ही जीवन है’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि मानव जीवन की मूल सच्चाई है। विद्यालयों में जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, जल के विवेकपूर्ण उपयोग और जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने के विषय में नियमित गतिविधियां आयोजित की जानी चाहिए।
बच्चों को यह समझाना होगा कि आज जल की बर्बादी भविष्य में गंभीर संकट का कारण बन सकती है। यदि बच्चे घर, विद्यालय और समाज में पानी बचाने की आदत विकसित करते हैं, तो इसका व्यापक सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है।
प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ जागरूकता
प्लास्टिक प्रदूषण वर्तमान समय की बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में शामिल है। बच्चों को प्लास्टिक के अत्यधिक उपयोग से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी देना जरूरी है। विद्यालयों में एकल उपयोग वाली प्लास्टिक वस्तुओं से बचने, कपड़े या जूट के थैले इस्तेमाल करने और कचरे को अलग-अलग रखने की आदत विकसित की जा सकती है।
शिक्षक स्वयं यदि इन आदतों का पालन करेंगे, तो विद्यार्थी भी उनसे प्रेरणा लेंगे। शिक्षक का व्यवहार बच्चों के लिए किसी भी पाठ्यपुस्तक से अधिक प्रभावशाली हो सकता है।
हर विद्यालय बने हरित परिसर
हम सरकार से आग्रह करते हैं कि प्रत्येक विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और अन्य शैक्षणिक संस्थानों को हरित एवं पर्यावरण-अनुकूल बनाने की जिम्मेदारी संस्था प्रमुखों के लिए अनिवार्य की जाए। प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान में ‘इको क्लब’ का गठन किया जाना चाहिए।
इको क्लब के माध्यम से पौधारोपण, स्वच्छता अभियान, जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता से जुड़े कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जा सकते हैं। विद्यार्थियों को केवल पर्यावरण के बारे में पढ़ाया ही नहीं जाए, बल्कि उन्हें व्यावहारिक गतिविधियों से भी जोड़ा जाए।
शिक्षा के साथ व्यवहारिक गतिविधियां जरूरी
विद्यालयों में पर्यावरण संरक्षण से संबंधित संगोष्ठी, नाटक, भाषण प्रतियोगिता, चित्रकला प्रतियोगिता, रैलियां, पोस्टर अभियान और स्वच्छता कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। विद्यार्थियों को कचरे के पृथक्करण और उसके उचित प्रबंधन की जानकारी दी जानी चाहिए।
स्थानीय नदी, तालाब, पार्क या वन क्षेत्र का शैक्षणिक भ्रमण कराकर बच्चों को स्थानीय पर्यावरण और जैव विविधता से परिचित कराया जा सकता है। इससे पर्यावरण शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विद्यार्थियों के दैनिक जीवन का हिस्सा बनेगी।
शिक्षक निभाएं अपना पर्यावरणीय धर्म
शिक्षक समाज की धुरी हैं। उनके पास नई पीढ़ी के विचारों को आकार देने की शक्ति है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को शिक्षक के सामाजिक दायित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
हम स्वयं भी मूलतः शिक्षक हैं और इसीलिए मानते हैं कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में शिक्षक धर्म निभाना हमारा परम कर्तव्य है। यदि प्रत्येक शिक्षक अपने विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति प्रेम, जल संरक्षण, वृक्षारोपण, स्वच्छता और प्रदूषण से मुक्ति का संकल्प विकसित कर सके, तो आने वाले समय में इसके व्यापक परिणाम सामने आएंगे।
अंततः हमारा स्पष्ट मत है कि पर्यावरण संकट से निपटने के लिए सरकार, प्रशासन और समाज के साथ शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह आलेख किसी वर्ग की आलोचना के लिए नहीं, बल्कि जनजागरण और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करने के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है।
यदि देश का प्रत्येक शिक्षक युवा पीढ़ी को भारत को स्वच्छ, सुंदर, हरित और प्रदूषणमुक्त बनाने का संकल्प आत्मसात करा दे, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा परिवर्तन संभव है। आज आवश्यकता है कि शिक्षक केवल कक्षा में पर्यावरण का पाठ न पढ़ाएं, बल्कि स्वयं पर्यावरण संरक्षण के आदर्श बनें और विद्यार्थियों को भी व्यवहार के माध्यम से प्रेरित करें।
एक पौधा लगाना शुरुआत है, उसकी देखभाल करना जिम्मेदारी है और आने वाली पीढ़ी के लिए हरित भविष्य तैयार करना हमारा सामूहिक कर्तव्य है।







