आलेख: डॉ. श्याम नंदन प्रसाद
पीएच.डी. (प्लांट इकोलॉजी), पूर्व प्राचार्य एवं पर्यावरणविद्, पटना, बिहार
नवरात्रि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व शक्ति की उपासना, आस्था, साधना और आत्मशुद्धि का प्रतीक है। लेकिन धार्मिक मान्यताओं और आध्यात्मिक साधना से परे, नवरात्रि में पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और धरती पर जीवन के संतुलन का गहरा संदेश भी निहित है। यदि हम इस पर्व की परंपराओं को पर्यावरणीय दृष्टिकोण से समझें, तो यह स्पष्ट होता है कि प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन की भावना हमारी सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग रही है।
आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वनों की कटाई, जैव विविधता के क्षरण और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है, तब नवरात्रि के पर्यावरणीय संदेश को समझना और उसे अपने जीवन में अपनाना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
कलश स्थापना में जल, मिट्टी और वनस्पतियों का महत्व
नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना की परंपरा है। कलश में जल भरना, उसके ऊपर आम की पत्तियां रखना तथा मिट्टी के पात्र में जौ बोना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के विभिन्न घटकों के महत्व को समझने का अवसर भी है।

जल जीवन का आधार है, मिट्टी वनस्पतियों को पोषण देती है और पौधे पृथ्वी पर जीवन के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आम की पत्तियां हरियाली, जीवंतता और वनस्पति संपदा की प्रतीक हैं। इन परंपराओं के माध्यम से हमें जल, मृदा और वनस्पतियों के संरक्षण की प्रेरणा मिलती है।
जौ का वैज्ञानिक नाम Hordeum vulgare है। यह घास कुल अर्थात् Poaceae का महत्वपूर्ण अनाज है। नवरात्रि के दौरान मिट्टी में बोए गए जौ के बीज अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित होकर पौधों का रूप धारण करते हैं। नौ दिनों के दौरान इनका विकास हमें बीज से पौधे बनने की प्राकृतिक प्रक्रिया को नजदीक से देखने का अवसर देता है।
बीज का अंकुरण यह संदेश देता है कि जीवन के विकास के लिए उपजाऊ मिट्टी, पर्याप्त नमी, वायु और अनुकूल तापमान आवश्यक हैं। यदि हम इन प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करेंगे, तभी धरती पर हरियाली और मानव जीवन में खुशहाली बनी रहेगी।
धरती पर हरियाली है, तभी हमारे जीवन में खुशहाली है। यह विचार केवल एक नारा नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन का मूल आधार है।
मां शैलपुत्री और पर्वतीय पारिस्थितिकी का संदेश
नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। धार्मिक परंपरा में उनका संबंध पर्वतराज हिमालय से माना जाता है। पर्वत, हिमालय, ग्लेशियर, नदियां और वन पृथ्वी की पारिस्थितिकी के महत्वपूर्ण अंग हैं।
पर्वतीय क्षेत्र जल के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं। हिमालय के ग्लेशियर अनेक नदियों के जल प्रवाह को बनाए रखने में योगदान देते हैं। पर्वतीय वन जैव विविधता के संरक्षण, मृदा अपरदन को रोकने और जलवायु संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आज अनियंत्रित निर्माण, वनों की कटाई, खनन और जलवायु परिवर्तन के कारण कई पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र दबाव का सामना कर रहे हैं। ऐसे में मां शैलपुत्री की आराधना को प्रकृति के प्रति सम्मान और पर्वतीय पर्यावरण की रक्षा के संकल्प से जोड़कर देखा जा सकता है।
हमें यह समझना होगा कि पर्वतों का संरक्षण केवल पहाड़ी क्षेत्रों के निवासियों की जिम्मेदारी नहीं है। पर्वतों से निकलने वाली नदियां, उनसे जुड़ी कृषि व्यवस्था और जल संसाधन करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं।
नवदुर्गा की उपासना और जैव विविधता का संरक्षण
नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। भारतीय परंपरा में अनेक देवी-देवताओं, धार्मिक अनुष्ठानों और लोक मान्यताओं का प्रकृति, वनस्पतियों तथा जीव-जंतुओं से गहरा संबंध रहा है।
पूजा-पाठ में तुलसी, आम की पत्तियां, फूल और अन्य वनस्पतियों का उपयोग किया जाता है। कई औषधीय पौधे, जैसे तुलसी, शतावरी और ब्राह्मी, पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन पौधों का संरक्षण हमारी वनस्पति संपदा और पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रखने में सहायक हो सकता है।
जैव विविधता का अर्थ पृथ्वी पर पाए जाने वाले पौधों, जीव-जंतुओं और सूक्ष्मजीवों की विविधता तथा उनके पारिस्थितिक संबंधों से है। यह विविधता खाद्य सुरक्षा, औषधीय संसाधनों, परागण, मिट्टी की उर्वरता और पारिस्थितिक संतुलन के लिए आवश्यक है।
हालांकि, केवल धार्मिक अनुष्ठानों में औषधीय पौधों का उपयोग करने से जैव विविधता का संरक्षण सुनिश्चित नहीं होता। इसके लिए पौधों की अंधाधुंध कटाई रोकना, स्थानीय प्रजातियों का रोपण करना, प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखना और औषधीय वनस्पतियों की वैज्ञानिक ढंग से खेती करना भी आवश्यक है।

नवरात्रि हमें इस दिशा में जागरूक होने और वनस्पति संपदा के संरक्षण के लिए व्यावहारिक कदम उठाने की प्रेरणा दे सकती है।
ऋतु परिवर्तन और प्रकृति के अनुकूल जीवनशैली
नवरात्रि वर्ष में दो प्रमुख अवसरों पर मनाई जाती है। चैत्र नवरात्रि वसंत ऋतु के आसपास और शारदीय नवरात्रि वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु के आगमन के समय आती है। इन अवसरों पर प्रकृति के स्वरूप में होने वाले बदलाव को अनुभव किया जा सकता है।
ऋतु परिवर्तन का प्रभाव तापमान, आर्द्रता, वनस्पतियों, कृषि और मानव जीवनशैली पर पड़ता है। ऐसे समय में खान-पान, दिनचर्या और स्वच्छता पर ध्यान देना उपयोगी होता है।
नवरात्रि के दौरान उपवास, फलाहार और सात्विक भोजन की परंपरा है। इन परंपराओं को संतुलित एवं जागरूक खान-पान, मौसमी फलों-सब्जियों के उपयोग और भोजन की बर्बादी रोकने के संदेश से जोड़ा जा सकता है।
उपवास का स्वास्थ्य पर प्रभाव व्यक्ति की शारीरिक स्थिति, उपवास की अवधि और भोजन के प्रकार पर निर्भर करता है। यह कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा कि उपवास करने से हर व्यक्ति के शरीर से विषाक्त पदार्थ अनिवार्य रूप से बाहर निकल जाते हैं या उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता निश्चित रूप से बढ़ जाती है। शरीर में अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन का कार्य मुख्य रूप से यकृत और गुर्दे जैसे अंग करते हैं।

इसलिए उपवास करते समय पर्याप्त जल, संतुलित पोषण और अपनी स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए। बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और कुछ स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को उपवास के संबंध में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
पर्यावरण की दृष्टि से भी स्थानीय और मौसमी खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देना, जरूरत के अनुसार भोजन तैयार करना तथा खाद्य अपशिष्ट को कम करना एक जिम्मेदार जीवनशैली का हिस्सा है।
ध्यान, साधना और मानसिक स्वास्थ्य
नवरात्रि के दौरान जप, ध्यान, दुर्गा पाठ और प्रार्थना की परंपरा है। नियमित ध्यान और साधना कई लोगों को मानसिक शांति, एकाग्रता और तनाव प्रबंधन में सहायता प्रदान कर सकते हैं।
शांत वातावरण में ध्यान करने से व्यक्ति को अपने विचारों और भावनाओं को समझने का अवसर मिलता है। यदि साधना के साथ प्रकृति के बीच समय बिताने, पेड़-पौधों की देखभाल करने और प्राकृतिक वातावरण को स्वच्छ रखने की आदत भी विकसित की जाए, तो इससे प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता बढ़ सकती है।
स्वस्थ पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़े हैं। स्वच्छ हवा, सुरक्षित पेयजल, प्रदूषणमुक्त वातावरण और हरित क्षेत्र जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए आध्यात्मिक साधना के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाना भी हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा होना चाहिए।
नवरात्रि को पर्यावरण अनुकूल कैसे बनाएं?
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी को भी महत्व दें। नवरात्रि के दौरान कुछ सरल उपाय अपनाकर हम प्रकृति पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को कम कर सकते हैं।
पहला, मिट्टी की प्रतिमाओं को प्राथमिकता दें। प्रतिमा निर्माण में प्राकृतिक मिट्टी और पर्यावरण के अनुकूल रंगों का उपयोग किया जाए। प्लास्टर ऑफ पेरिस तथा हानिकारक रासायनिक रंगों से बनी प्रतिमाएं जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकती हैं।
दूसरा, पूजा सामग्री का उचित निपटान करें। फूल, पत्तियां, माला और अन्य जैविक सामग्री को नदियों, तालाबों या जलाशयों में फेंकने के बजाय अलग एकत्रित करें। स्थानीय नियमों के अनुसार इनका कंपोस्ट बनाया जा सकता है। प्रतिमा विसर्जन के लिए निर्धारित स्थानों और प्रशासनिक निर्देशों का पालन करें।
तीसरा, प्लास्टिक का उपयोग कम करें। पूजा पंडालों और धार्मिक आयोजनों में एकल उपयोग वाले प्लास्टिक से बचें। कपड़े के थैले, पुनः उपयोग योग्य बर्तन और टिकाऊ सजावटी सामग्री अपनाएं।
चौथा, जल और बिजली बचाएं। पूजा के दौरान जल का विवेकपूर्ण उपयोग करें। अनावश्यक रोशनी और बिजली की खपत कम करें। संभव हो तो ऊर्जा दक्ष प्रकाश व्यवस्था अपनाएं।
पांचवां, पौधारोपण और हरित क्षेत्र को बढ़ावा दें। नवरात्रि के अवसर पर स्थानीय जलवायु के अनुकूल पौधे लगाएं और उनके जीवित रहने तक नियमित देखभाल करें। केवल पौधा लगाना पर्याप्त नहीं है; उसकी सुरक्षा और सिंचाई भी आवश्यक है।
छठा, ध्वनि प्रदूषण से बचें। धार्मिक आयोजनों में ध्वनि विस्तारक यंत्रों का उपयोग निर्धारित मानकों के अनुसार करें, ताकि बच्चों, बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और पशु-पक्षियों को अनावश्यक परेशानी न हो।
इन छोटे-छोटे प्रयासों से धार्मिक आयोजन अधिक स्वच्छ, सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल बनाए जा सकते हैं।
प्रकृति संरक्षण भी हमारा राष्ट्रधर्म और कर्तव्य
नवरात्रि शक्ति की उपासना का पर्व है। शक्ति का वास्तविक अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि सृजन, संरक्षण और कल्याण की भावना भी है। प्रकृति हमें जल, वायु, भोजन, औषधियां और जीवन के लिए आवश्यक संसाधन प्रदान करती है। इसलिए उसका संरक्षण करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।
आज पर्यावरण संकट से निपटने के लिए केवल सरकारी नीतियां और वैज्ञानिक प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। समाज के प्रत्येक व्यक्ति की भागीदारी आवश्यक है। परिवार, विद्यालय, धार्मिक संस्थाएं, सामाजिक संगठन और स्थानीय प्रशासन मिलकर पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बना सकते हैं।
नवरात्रि के शुभ अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम प्रकृति के साथ छेड़छाड़ नहीं करेंगे, प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग नहीं करेंगे और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ एवं सुरक्षित पर्यावरण छोड़ने का प्रयास करेंगे।
आइए, इस नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना के साथ एक पौधा लगाएं, जल बचाएं, प्लास्टिक का उपयोग कम करें और पूजा सामग्री का पर्यावरण अनुकूल निपटान करें। साथ ही, लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल का दायित्व भी निभाएं।
यदि हम नवरात्रि के दौरान मिलने वाले पर्यावरणीय संदेश को अपने आचरण में उतार सकें, तो प्रकृति के संरक्षण की दिशा में हमारा योगदान महत्वपूर्ण होगा। मां दुर्गा की आराधना तभी व्यापक सामाजिक अर्थ प्राप्त करेगी, जब हम मानव सहित सभी जीवों के कल्याण और पृथ्वी के संरक्षण के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे।
प्रकृति का सम्मान करें, उसका सदुपयोग करें, दुरुपयोग नहीं। धरती सुरक्षित रहेगी, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।
आइए, नवरात्रि पर संकल्प लें कि हम हरियाली बढ़ाएंगे, जैव विविधता बचाएंगे और स्वच्छ पर्यावरण के निर्माण में अपनी सकारात्मक भागीदारी सुनिश्चित करेंगे। यह केवल हमारा सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।







