“हरिलाजोड़ी: देवघर का वह रहस्यमयी धाम जहाँ विष्णु ने छला था रावण को, जानिए ‘हरतकीनाथ’ के हारीतकी वन से बाबा बैद्यनाथ की स्थापना तक का संपूर्ण इतिहास”

Written by Sanjay Kumar

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आलेख:- संजय कुमार
झारखंड का देवघर नगर केवल ‘बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग’ के लिए ही नहीं, बल्कि अपने आसपास बिखरे कई ऐसे पौराणिक और आध्यात्मिक स्थलों के लिए भी विख्यात है, जिनका सीधा संबंध रामायण और शिवपुराण काल से है। ऐसा ही एक परम पावन और ऐतिहासिक स्थल है—’श्री श्री 108 बाबा हरतकीनाथ धाम, हरिलाजोड़ी’। मुख्य देवघर मंदिर (बाबा मंदिर) से उत्तर दिशा में करीब 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह पावन धाम आज भी सनातन संस्कृति, इतिहास और जन-आस्था का एक अद्भुत केंद्र बना हुआ है। apnanalanda.com की विशेष रिपोर्ट में आज हम आपको ले चल रहे हैं हरिलाजोड़ी के उस स्वर्णिम इतिहास के सफर पर, जहाँ कभी ‘हरि’ (विष्णु) और ‘हर’ (शिव) का मिलन हुआ था।

नाम का रहस्य: क्यों कहलाया यह स्थान ‘हरिलाजोड़ी’?
इस पावन भूमि के नामकरण के पीछे एक बहुत ही सुंदर और आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है। हिंदू धर्मग्रंथों में ‘हरि’ शब्द का प्रयोग भगवान विष्णु के लिए और ‘हर’ शब्द का प्रयोग देवाधिदेव महादेव शिव के लिए किया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग में यही वह विशिष्ट भौगोलिक स्थल था जहाँ एक विशेष लीला के तहत भगवान विष्णु और महादेव की शक्तियां एक साथ समाहित या ‘जोड़ी’ के रूप में प्रकट हुई थीं। हरि और हर के इसी पावन मिलन के कारण सदियों से इस स्थल को हरिलाजोड़ी या स्थानीय भाषा में ‘हरलाजुरी’ के नाम से पुकारा जाता है।

रामायण कालीन इतिहास: रावण की लंका यात्रा और देवताओं का भय

हरिलाजोड़ी का इतिहास सीधे तौर पर लंकापति रावण की उस हठ और तपस्या से जुड़ा है, जब उसने भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे लंका चलने का वरदान मांग लिया था। कथा के अनुसार, रावण चाहता था कि महादेव साक्षात उसकी स्वर्ण नगरी लंका में निवास करें। महादेव ने रावण की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे एक ‘अमोघ शिवलिंग’ दिया, लेकिन साथ ही एक कड़ी शर्त भी रख दी। शर्त यह थी कि लंका पहुँचने से पूर्व रावण इस शिवलिंग को मार्ग में जहाँ भी पृथ्वी पर रख देगा, यह शिवलिंग वहीं स्थापित हो जाएगा और फिर इसे दोबारा उठाया नहीं जा सकेगा।
रावण शिवलिंग को लेकर आकाश मार्ग से लंका की ओर चल पड़ा। जब वह वर्तमान संथाल परगना (देवघर क्षेत्र) के ऊपर से गुजर रहा था, तब स्वर्ग में देवताओं के बीच हाहाकार मच गया। देवताओं को ज्ञात था कि यदि रावण इस अमोघ शिवलिंग को लंका ले जाने में सफल रहा, तो उसकी शक्ति असीमित हो जाएगी और वह अधर्म के साम्राज्य को पूरी सृष्टि पर फैला देगा।

वरुण देव की माया और ग्वाले के रूप में नारायण का अवतरण
रावण को मार्ग में ही रोकने के लिए सभी देवताओं ने मिलकर भगवान विष्णु से प्रार्थना की। योजना के अनुसार, सबसे पहले वरुण देव ने रावण के उदर (पेट) में जल के रूप में प्रवेश किया। इसके प्रभाव से रावण को अचानक तीव्र लघुशंका (पेशाब) की इच्छा हुई। वेग इतना तीव्र था कि रावण के लिए शिवलिंग को हाथ में लेकर आगे बढ़ना असंभव हो गया। वह नीचे धरती पर उतरा, जो कि वर्तमान का हरिलाजोड़ी क्षेत्र था।
शर्त के मुताबिक रावण शिवलिंग को जमीन पर नहीं रख सकता था। वह किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करने लगा जो कुछ समय के लिए इस भारी शिवलिंग को अपने हाथों में थाम सके। उसी समय, भगवान विष्णु देवताओं के संकट को दूर करने के लिए एक वृद्ध ब्राह्मण और ग्वाले (चरवाहे) का भेष धारण कर रावण के सामने प्रकट हुए। रावण ने उस ग्वाले को देखा और राहत की सांस लेते हुए उससे शिवलिंग को कुछ देर हाथ में पकड़ने का अनुरोध किया। ग्वाले ने रावण की बात मान ली, लेकिन उसने भी एक शर्त रख दी कि यदि शिवलिंग अत्यधिक भारी हो गया तो वह उसे अधिक समय तक नहीं थामेगा।

शिवलिंग की स्थापना और हारीतकी वन का प्राकट्य

रावण जैसे ही लघुशंका के लिए गया, उसे वरुण देव की माया के कारण अत्यधिक समय लग गया। इसी बीच, ग्वाले का रूप धारण किए भगवान विष्णु ने लीला रची और शिवलिंग के भार को अत्यधिक बढ़ा दिया। अंततः, भारीपन का बहाना बनाकर उन्होंने उस ज्योतिर्लिंग को इसी पावन भूमि पर रख दिया। जैसे ही शिवलिंग ने पृथ्वी का स्पर्श किया, वह सदा-सदा के लिए वहीं भूमि में समा गया। जब रावण वापस लौटा, तो शिवलिंग को भूमि पर स्थापित देख अत्यंत क्रोधित और दुखी हुआ। उसने अपनी पूरी शक्ति लगाकर शिवलिंग को उखाड़ने का प्रयास किया, परंतु महादेव की शर्त के आगे उसकी एक न चली। वह निराश होकर लंका लौट गया। इस प्रकार, जिस मुख्य शिवलिंग को देवताओं ने यहाँ रखवाया था, वह आज का [बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग है, और जहाँ रावण उस ग्वाले से मिला था, वह स्थान हरिलाजोड़ी के रूप में अमर हो गया।
‘बाबा हरतकीनाथ’ नाम कैसे पड़ा?
प्राचीन धार्मिक ग्रंथों, विशेषकर आनंद रामायण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि प्राचीन काल में यह संपूर्ण क्षेत्र हरीतकी (जिसे आयुर्वेद में हर्रे या मायरोबालन कहा जाता है) के घने और विशाल जंगलों से आच्छादित था। इस औषधीय और पवित्र वन को ‘हरीतकी वन’ या ‘हरिद्रा वन’ कहा जाता था। इसी हरीतकी वन के बीच स्थित होने के कारण यहाँ के स्थानीय शिवालय और महादेव के स्वरूप को ‘बाबा हरतकीनाथ’ के नाम से पूजा जाने लगा। आज भी यहाँ आने वाले श्रद्धालु बाबा हरतकीनाथ के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं।
रावण जोरी (जल स्रोत) और शूलहरिणी तालाब का रहस्य
हरिलाजोड़ी मंदिर परिसर और उसके आसपास आज भी कुछ ऐसे जीवंत साक्ष्य मौजूद हैं जो इस पौराणिक कथा की पुष्टि करते हैं:

  1. रावण जोरी: जनश्रुतियों और लोक मान्यताओं के अनुसार, रावण ने जिस स्थान पर अपनी दीर्घ लघुशंका का त्याग किया था, वरुण देव के उसी पवित्र जल से यहाँ एक निरंतर बहने वाली जलधारा का निर्माण हुआ, जिसे ‘रावण जोरी’ कहा जाता है।
  2. शूलहरिणी तालाब: मंदिर के समीप एक विशाल और ऐतिहासिक तालाब स्थित है, जिसे ‘शूलहरिणी तालाब’ के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इस तालाब के जल में कई प्रकार के चर्म रोगों और कष्टों को दूर करने की अद्भुत क्षमता है।
  3. भगवान विष्णु के पद-चिह्न: इस परिसर में एक शिला पर भगवान विष्णु के पौराणिक पैरों के निशान (पद-चिह्न) अंकित हैं। मान्यता है कि ग्वाले का रूप छोड़कर जब नारायण अपने वास्तविक स्वरूप में आए, तो उनके चरणों के निशान यहाँ छप गए। श्रद्धालु बाबा शिव के साथ-साथ इन लक्ष्मीपति नारायण के चरणों की भी विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
    वर्तमान स्थिति और सावन मास का महत्व
    आज के समय में बाबा हरतकीनाथ धाम, हरिलाजोड़ी देवघर आने वाले कांवड़ियों और सनातन धर्मावलंबियों के लिए एक अनिवार्य दर्शनीय स्थल बन चुका है। विशेष रूप से श्रावण (सावन) मास और भादों के महीने में जब सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर लाखों कांवरिया बाबा बैद्यनाथ धाम पहुँचते हैं, तब वे अपनी यात्रा को पूर्ण करने और पुण्य कमाने के लिए हरिलाजोड़ी मंदिर भी आते हैं। सावन के सोमवार को यहाँ पैर रखने की जगह नहीं होती। पूरे परिसर को रंग-बिरंगी रोशनी और फूलों से सजाया जाता है, और ‘हर-हर महादेव’ तथा ‘जय शिव’ के नारों से पूरा वातावरण गुंजायमान रहता है।
    निष्कर्ष: पर्यटन और आध्यात्मिक विकास की आवश्यकता
    apnanalanda.com के माध्यम से हम सरकार और स्थानीय प्रशासन का ध्यान इस ओर भी आकर्षित करना चाहते हैं कि इतने महान ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के बावजूद, हरिलाजोड़ी धाम को वह राष्ट्रीय वैश्विक पहचान नहीं मिल पाई है, जिसका यह हकदार है। यदि इस क्षेत्र को एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित किया जाए, यहाँ बुनियादी सुविधाएं, शुद्ध पेयजल, ठहरने के लिए धर्मशालाएं और रावण जोरी व शूलहरिणी तालाब का सुंदरीकरण और बेहतर ढंग से किया जाए, तो यह न केवल देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करेगा बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगा। बाबा हरतकीनाथ धाम की यह पवित्र भूमि आज भी चीख-चीख कर अपने स्वर्णिम इतिहास की गवाही दे रही है, बस आवश्यकता है इसे सही ढंग से सहेजने और प्रचारित करने की।

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