हरतालिका तीज : सुहाग की कामना के साथ प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा पर्व

Written by Sanjay Kumar

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आलेख : प्रो. श्याम नंदन प्रसाद

पूर्व प्राचार्य एवं पर्यावरणविद्

मुख्य समन्वयक, वनस्पति शास्त्र विभाग, नालंदा खुला विश्वविद्यालय, नालंदा, बिहार, इंडिया

हरतालिका तीज भारत की समृद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं में एक महत्वपूर्ण पर्व है। आम बोलचाल की भाषा में इसे केवल ‘तीज’ कहा जाता है। मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में इसे श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों, विशेषकर कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में भी इससे मिलती-जुलती परंपरा ‘गौरी हब्बा’ के रूप में प्रचलित है। बिहार और झारखंड में सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से भगवान शिव एवं माता पार्वती की आराधना करती हैं। कई कुंवारी युवतियां भी मनोवांछित एवं योग्य वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं।

हरतालिका तीज की सबसे विशिष्ट बात इसका निर्जला स्वरूप है। अनेक महिलाएं पूरे दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में महिलाएं बालू अथवा मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं बनाकर उनकी पूजा करती हैं और रात में जागरण करती हैं। यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति से मनुष्य के गहरे संबंध को भी दर्शाती है।

यदि तीज पर्व को धार्मिक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर पर्यावरणीय नजरिये से देखा जाए, तो इसके भीतर प्रकृति संरक्षण का एक महत्वपूर्ण संदेश दिखाई देता है। भारतीय संस्कृति में भगवान शिव को प्रकृति और जीव-जगत का संरक्षक माना गया है। उनका पर्वतों पर निवास, गले में सर्प धारण करना, जटाओं में गंगा का वास और उनके साथ विभिन्न जीव-जंतुओं का जुड़ाव प्रकृति के प्रति सह-अस्तित्व और संरक्षण की भावना को प्रदर्शित करता है। शिव की आराधना के माध्यम से कहीं न कहीं यह संदेश भी मिलता है कि मनुष्य को प्रकृति के प्रत्येक जीव और संसाधन के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।

तीज पर्व में मिट्टी और बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाने की परंपरा भी धरती के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। मिट्टी केवल पूजा की सामग्री नहीं, बल्कि हमारे जीवन का आधार है। मिट्टी से ही अन्न पैदा होता है, वनस्पतियां विकसित होती हैं और मानव सभ्यता का अस्तित्व कायम रहता है। मिट्टी के दीये का प्रयोग भी इसी प्राकृतिक जुड़ाव को दर्शाता है। आधुनिक समय में जब प्लास्टिक और कृत्रिम सामग्रियों का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है, तब मिट्टी के पारंपरिक दीये और प्राकृतिक सामग्री का उपयोग पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली का संदेश देता है।

तीज की पूजा में फूल, फल, बेलपत्र, आम की पत्तियां, धतूरा सहित विभिन्न वनस्पतियों का प्रयोग किया जाता है। इन सामग्रियों का धार्मिक महत्व तो है ही, साथ ही यह हमें वनस्पतियों के महत्व का स्मरण भी कराता है। भारतीय परंपरा में अनेक पेड़-पौधों को धार्मिक आस्था से जोड़कर उनके संरक्षण की व्यवस्था विकसित की गई थी। पीढ़ियों से चली आ रही ऐसी परंपराओं ने समाज में वृक्षों और वनस्पतियों के प्रति सम्मान की भावना पैदा की।

तुलसी और नीम जैसे पौधों का विशेष महत्व है। दोनों ही पौधे अपने औषधीय गुणों के लिए जाने जाते हैं। इनकी पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि इनके संरक्षण और उपयोगिता के प्रति सामाजिक जागरूकता का माध्यम भी मानी जा सकती है। इसी प्रकार बेल, आम और अन्य उपयोगी पौधों का धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयोग उनके प्रति लोगों के भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करता है।

तीज पर्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष जलस्रोतों से भी जुड़ा हुआ है। पूजा के बाद प्रतिमाओं का नदी, तालाब या अन्य जलाशयों में विसर्जन करने की परंपरा रही है। हालांकि वर्तमान समय में विसर्जन के दौरान पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली रासायनिक रंगों, प्लास्टिक और अन्य कृत्रिम सामग्रियों के इस्तेमाल से बचना जरूरी है। यदि प्रतिमाएं केवल प्राकृतिक मिट्टी और जैव-अवक्रमणीय सामग्री से बनाई जाएं तथा प्राकृतिक जलस्रोतों को प्रदूषित किए बिना विसर्जन की व्यवस्था की जाए, तो यह परंपरा पर्यावरण संरक्षण के साथ और अधिक सामंजस्य स्थापित कर सकती है।

वर्षा ऋतु में मनाया जाने वाला तीज पर्व अपने आप में प्रकृति के नवजीवन का उत्सव भी है। बारिश के बाद धरती हरी-भरी हो जाती है। खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं और पेड़-पौधों में नई हरियाली दिखाई देती है। ऐसे समय में मनाया जाने वाला यह पर्व मानो प्रकृति के इस मनोहारी रूप का स्वागत करता है। वर्षा, जल, मिट्टी, हरियाली और वनस्पतियां तीज की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

तीज की पारंपरिक पूजा-पद्धति में प्राकृतिक रंगों का भी प्रयोग होता है। मेहंदी और हल्दी जैसे पदार्थ प्रकृति से प्राप्त होते हैं। मिट्टी के दीये, पत्तों के दोने और प्राकृतिक पूजा सामग्री का उपयोग हमारे पूर्वजों की पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को दर्शाता है। यह परंपरा आज के दौर में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है, जब प्लास्टिक प्रदूषण, रासायनिक कचरा और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं।

तीज पर्व से हमें यह सीख लेने की आवश्यकता है कि धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। पूजा-पर्वों में यदि स्थानीय, प्राकृतिक और पुनर्चक्रण योग्य सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाए, प्लास्टिक का बहिष्कार किया जाए तथा जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाया जाए, तो धार्मिक परंपराओं को पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी माध्यम बनाया जा सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हरतालिका तीज की प्राचीन पर्यावरण-अनुकूल परंपराओं को आधुनिक समय में भी जीवित रखा जाए। पूजा के लिए मिट्टी की प्रतिमा, प्राकृतिक रंग, स्थानीय फूल-पत्तियां और जैव-अवक्रमणीय सामग्री का इस्तेमाल हो। प्लास्टिक की सजावट एवं अन्य प्रदूषणकारी वस्तुओं से दूरी बनाई जाए। जलस्रोतों में कचरा न डालने और विसर्जन के लिए पर्यावरण-अनुकूल व्यवस्था अपनाने की दिशा में भी समाज को जागरूक होना चाहिए।

वास्तव में हरतालिका तीज केवल सुहागिन महिलाओं के व्रत और भगवान शिव-माता पार्वती की आराधना का पर्व नहीं है। इसके भीतर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, वनस्पतियों के प्रति सम्मान, जलस्रोतों के संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का संदेश भी निहित है। शिव और पार्वती का पुनर्मिलन तथा उनका अटूट प्रेम जहां पारिवारिक जीवन में प्रेम, समर्पण और विश्वास का प्रतीक है, वहीं तीज की प्रकृति-आधारित परंपराएं मनुष्य और पर्यावरण के बीच संतुलित संबंध की प्रेरणा देती हैं।

इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि हरतालिका तीज भारतीय संस्कृति में प्रकृति और मानव जीवन के अद्भुत सामंजस्य का एक अनूठा उदाहरण है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम इस पर्व की मूल पर्यावरण-अनुकूल भावना को समझें, उसे व्यवहार में उतारें और आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाएं।

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