लेखक: वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया
पटना के 10 सर्कुलर रोड स्थित सरकारी आवास को लेकर एक बार फिर बिहार की राजनीति गरमा गई है। पुलिस बल की मौजूदगी, सरकारी नोटिस, राजनीतिक बयानबाजी और मीडिया की सुर्खियों ने इस मामले को एक बड़े राजनीतिक मुद्दे का रूप दे दिया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस लड़ाई में जनता कहां है?
जिस बिहार की जनता रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सड़क, सिंचाई और उद्योगों की मांग कर रही है, वहां राजनीतिक विमर्श एक सरकारी बंगले के इर्द-गिर्द घूम रहा है। यह केवल एक आवास विवाद नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति की उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें सत्ता और सुविधाएं छोड़ना नेताओं के लिए सबसे कठिन काम बन जाता है।10 सर्कुलर रोड का यह बंगला वर्षों से बिहार की राजनीति का प्रतीक रहा है। लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार लंबे समय से यहां रह रहा है। भवन निर्माण विभाग का कहना है कि राबड़ी देवी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में दूसरा सरकारी आवास आवंटित किया जा चुका है और नियमों के अनुसार पुराने आवास को खाली करना चाहिए। दूसरी ओर राजनीतिक बयानबाजी इस विवाद को भावनात्मक और राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है।
लेकिन आम नागरिक की नजर से देखें तो प्रश्न बेहद सीधा है। यदि किसी सरकारी कर्मचारी का तबादला हो जाए और वह सरकारी क्वार्टर खाली न करे, तो क्या प्रशासन उसे वर्षों तक रहने देगा? यदि कोई सामान्य नागरिक सरकारी जमीन या भवन पर कब्जा बनाए रखे, तो क्या उसके लिए भी इतनी सहूलियत दिखाई जाएगी? शायद नहीं।यहीं से जनता के मन में व्यवस्था के प्रति सवाल पैदा होते हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत कानून का समान रूप से लागू होना है। जब जनता को यह महसूस होने लगता है कि नियम केवल आम लोगों के लिए हैं और प्रभावशाली लोगों के लिए नहीं, तब व्यवस्था पर विश्वास कमजोर पड़ने लगता है।यह भी सच है कि केवल विपक्ष को कटघरे में खड़ा कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। सत्ता पक्ष को भी आत्ममंथन करना चाहिए। भारत की राजनीति में सरकारी बंगले, लाल बत्ती, विशेष सुरक्षा, सरकारी सुविधाएं और वीआईपी संस्कृति का इतिहास किसी एक दल से जुड़ा हुआ नहीं है। लगभग सभी दलों के नेताओं पर अलग-अलग समय में ऐसे आरोप लगते रहे हैं।
आज यदि विपक्ष पर सरकारी आवास को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो कल सत्ता पक्ष के कई नेताओं पर भी ऐसे आरोप लग चुके हैं। इसलिए यह बहस किसी एक बंगले या एक परिवार की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति की है जिसमें जनसेवा का दावा करने वाले लोग सुविधाओं से अलग होने को तैयार नहीं दिखते।विडंबना यह है कि जिस राज्य में लाखों युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन करते हैं, वहां राजनीतिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा बंगले और सरकारी सुविधाओं की लड़ाई में खर्च हो रहा है। बिहार के गांवों में आज भी ऐसे परिवार हैं जिनके पास रहने के लिए पक्का मकान नहीं है। हजारों परिवार किराए के मकानों में जिंदगी गुजार रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग प्रधानमंत्री आवास योजना और अन्य सरकारी योजनाओं की प्रतीक्षा में हैं।
ऐसे में जब जनता नेताओं को सरकारी आवासों के लिए संघर्ष करते हुए देखती है, तो उसके मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि आखिर राजनीति का उद्देश्य क्या है? क्या राजनीति जनसेवा का माध्यम है या विशेषाधिकारों को बनाए रखने का साधन?यह भी ध्यान देने योग्य है कि ऐसे विवाद अक्सर जनता के असली मुद्दों को पीछे धकेल देते हैं। मीडिया की बहस बंगले पर केंद्रित हो जाती है, राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगते हैं और जनता के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण विषय हाशिए पर चले जाते हैं।
महंगाई लगातार आम परिवारों के बजट को प्रभावित कर रही है। युवाओं में रोजगार को लेकर चिंता बनी हुई है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत करने की आवश्यकता है। किसानों की आय बढ़ाने की चुनौती अभी भी मौजूद है। लेकिन इन सवालों पर गंभीर राजनीतिक बहस अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि केवल विपक्ष की आलोचना कर देने से जनता की समस्याएं समाप्त नहीं होंगी। जनता परिणाम चाहती है। यदि सरकार नियमों का पालन सुनिश्चित करना चाहती है तो उसे पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से कार्य करना होगा ताकि कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध नहीं बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में दिखाई दे।वहीं विपक्ष को भी यह समझना होगा कि जनता अब पहले की तुलना में अधिक जागरूक है। केवल भावनात्मक राजनीति या राजनीतिक शोर से मतदाताओं को लंबे समय तक प्रभावित नहीं किया जा सकता। जनता यह देख रही है कि नेता जो बातें मंच से कहते हैं, क्या वे स्वयं अपने जीवन में उनका पालन करते हैं या नहीं।भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट आज विश्वास का संकट बनता जा रहा है। जनता और राजनीतिक वर्ग के बीच दूरी बढ़ रही है। इसका कारण केवल आर्थिक या सामाजिक समस्याएं नहीं हैं, बल्कि वह धारणा भी है कि राजनीति धीरे-धीरे आम लोगों के जीवन से दूर होती जा रही है।जब कोई नेता सादगी की बात करता है और स्वयं विशेष सुविधाओं से घिरा रहता है, तब उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है। जब कोई दल पारदर्शिता की मांग करता है लेकिन अपने मामलों में अलग मानदंड चाहता है, तब जनता सवाल पूछती है। जब सत्ता पक्ष जवाबदेही की बात करता है लेकिन अपने लोगों पर अलग रवैया अपनाता है, तब भी लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर होता है।आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल जनता को केंद्र में रखें। यदि सरकारी आवास खाली करना नियम है तो उसका पालन होना चाहिए। यदि नियमों में कोई अस्पष्टता है तो उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। लेकिन किसी भी स्थिति में जनता के सामने यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि कानून और व्यवस्था केवल कमजोर लोगों के लिए है।
बिहार ने लंबे समय तक राजनीतिक संघर्षों, सामाजिक आंदोलनों और लोकतांत्रिक प्रयोगों को देखा है। इस राज्य ने देश को बड़े नेता दिए हैं और राजनीतिक चेतना का मजबूत उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसलिए बिहार की जनता अब केवल नारों से संतुष्ट नहीं होती। वह आचरण और परिणाम दोनों देखना चाहती है।आज का मतदाता यह जानना चाहता है कि उसके बच्चों को रोजगार कब मिलेगा। गांवों में उद्योग कब आएंगे। शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता कब सुधरेगी। किसानों की आय कैसे बढ़ेगी। महिलाओं की सुरक्षा और युवाओं के भविष्य के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे। लेकिन इन सवालों का उत्तर अक्सर राजनीतिक शोर में दब जाता है।10 सर्कुलर रोड का विवाद चाहे जिस निष्कर्ष पर पहुंचे, लेकिन इसने एक बार फिर भारतीय राजनीति के सामने आईना रख दिया है। यह आईना पूछ रहा है कि क्या राजनीति वास्तव में जनता के लिए है या फिर सत्ता और सुविधाओं के संरक्षण का माध्यम बन चुकी है?
जनता की अदालत सबसे बड़ी अदालत होती है। वह सब देखती है, सब सुनती है और समय आने पर अपना फैसला भी सुनाती है। इसलिए सत्ता और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में असली मालिक जनता है, बंगले नहीं।जब तक राजनीति का केंद्र जनता नहीं बनेगी, तब तक बंगले बदलते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी, चेहरे बदलते रहेंगे, लेकिन आम नागरिक के सवाल वहीं के वहीं खड़े रहेंगे।आज जरूरत किसी बंगले को बचाने या खाली कराने की बहस से आगे बढ़कर उस बिहार की बात करने की है जो अवसर चाहता है, विकास चाहता है, रोजगार चाहता है और सबसे बढ़कर ऐसी राजनीति चाहता है जो विशेषाधिकार नहीं बल्कि जवाबदेही का प्रतीक बने।
क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत सरकारी आवासों में नहीं, बल्कि उन करोड़ों नागरिकों में बसती है जिनके विश्वास पर पूरी राजनीतिक व्यवस्था खड़ी है।





