टिकट, पुतला और “दस लखिया” नेताजी

Written by Sanjay Kumar

Published on:

नालंदा की राजनीति में एक ऐसे नेताजी इन दिनों खूब चमक रहे हैं, जिनकी असली विचारधारा “जहां लाभ, वहीं प्रभाव” मानी जाती है। कभी एक राष्ट्रीय पार्टी के जिलाध्यक्ष रहे नेताजी विधानसभा चुनाव आते ही टिकट के लिए इतने सक्रिय हुए कि पार्टी कार्यालय की कुर्सियां तक उन्हें देखकर मुस्कुराने लगीं। लेकिन जैसे ही टिकट किसी और की झोली में गया, नेताजी की आत्मा अचानक आहत हो गई और उन्होंने विचारधारा समेत पार्टी को प्रणाम कर दिया।
फिर दूसरी पार्टी ने नेताजी की “जनप्रियता” को देखते हुए टिकट थमा दिया। समर्थकों ने मिठाइयां बांटी, बैनर लगे, नारे गूंजे। मगर लोकतंत्र को शायद यह रिश्ता मंजूर नहीं था। चुनाव लड़ने से पहले ही नामांकन पत्र रद्द हो गया और नेताजी मैदान में उतरे बिना ही “संघर्षशील नेता” घोषित हो गए।


अब स्थिति यह है कि नेताजी पुरानी पार्टी में लौटे हैं या नहीं, यह खुद पार्टी को भी ठीक से पता नहीं। मगर प्रेस विज्ञप्ति रोज उसी पार्टी के नाम से जारी हो रही है। पुतला दहन में नेताजी की विशेषज्ञता ऐसी है कि शहर में टायर जलने की खबर आए तो लोग पहले उनका हालचाल पूछते हैं।
नेताजी की सबसे चर्चित पहचान “दस लखिया” के रूप में है। कहा जाता है कि दस लाख का लोन दिलाने के नाम पर पहले सेवा शुल्क जमा कराया जाता है। लोन मिले तो नेताजी का आशीर्वाद, न मिले तो बैंक मैनेजर दोषी। फिर शुरू होता है धरना, प्रदर्शन और मुकदमे का नया अध्याय। जनता अब समझ चुकी है कि नेताजी के सपनों में लोन कम और हंगामा ज्यादा मिलता है।

Leave a Comment