सम्राट चौधरी के फैसलों में दिख रही नीतीश कुमार की छाप—रणनीति या मजबूरी?चंदन चौरसिया

Written by Sanjay Kumar

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पटना(अपना नालंदा)। वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि बिहार में सिर्फ मोदी-नीतीश मॉडल ही चलेगा।मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद 15 अप्रैल को सम्राट चौधरी ने यह बात कही। उसके बाद से वह सदन से लेकर भाषणों तक में इस लाइन को कई बार दोहरा चुके हैं।

बार-बार पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिल रहे हैं। सम्राट चौधरी के शुरुआती 11 दिन ‘संतुलन’ बनाने के दिख रहे हैं।

लेकिन क्या वे आने वाले समय में अपनी अलग पहचान बना पाएंगे या ‘नीतीश की विरासत’ के वाहक बनकर ही रह जाएंगे। जानेंगे, आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में…।

सम्राट सरकार के नीतीश मॉडल पर चलने के 3 संकेत

  1. अफसरों की पुरानी लॉबी

अक्सर देखा जाता है कि जब भी कोई नया मुख्यमंत्री कार्यभार संभालता है तो वह अपनी पसंद के अधिकारियों की टीम बनाता है। लेकिन सम्राट चौधरी के मामले में तस्वीर अलग है। उनके इर्द-गिर्द आज भी वही अधिकारी हैं, जो पिछले कुछ सालों से नीतीश कुमार के ‘कोर ग्रुप’ का हिस्सा रहे हैं।

नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले रिटायर आईएएस अफसर दीपक कुमार की सक्रियता सबसे अधिक चर्चा में है। चर्चा है कि जिस तरह वे नीतीश कुमार के लिए ‘संकटमोचक’ थे, अब वही भूमिका वे सम्राट चौधरी के पीछे खड़े होकर निभा रहे हैं।

चौरसिया ने कहा कि सम्राट चौधरी फिलहाल नौकरशाही में किसी भी बड़े सर्जिकल स्ट्राइक के मूड में नहीं हैं। वे उसी पुराने ढांचे के साथ तालमेल बिठा रहे हैं, जिसे नीतीश कुमार ने तैयार किया था।

बताया जा रहा है कि सम्राट जानते हैं कि यदि वे अचानक इस तंत्र को बदलते हैं, तो शासन की पकड़ ढीली हो सकती है।

  1. नीतीश की पॉलिसी को कॉपी किया

सम्राट चौधरी केवल अफसरों के मामले में ही नहीं, बल्कि कार्यशैली में भी नीतीश मॉडल को ही अपना रहे हैं। उनकी पॉलिसी को कॉपी भी कर रहे हैं। जैसे-11 शहरों में नई ग्रीनफील्ड टाउनशिप बनाने का ऐलान।

नीतीश कुमार की 10वीं सरकार की पहली कैबिनेट की बैठक (25 नवंबर 2025) में टाउनशिप बनाने पर मुहर लगी। उसी एजेंडे को सम्राट चौधरी ने भी अपनी पहली कैबिनेट की बैठक (22 अप्रैल 2026) में मुहर लगाई।

मतलब एक ही योजना को दोनों नेताओं ने अपनी पहली कैबिनेट में जगह दी। इसके अलावा जीविका दीदी को पैसा देना हो, 5 साल में एक करोड़ रोजगार का वादा जैसी नीतीश कुमार की योजनाओं को पूरा करने की सम्राट चौधरी तैयारी कर रहे हैं।

  1. 10 दिन में 4 बार नीतीश से मिले सम्राट

चौरसिया ने कहा कि सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बनने के बाद भी नीतीश कुमार से लगातार संपर्क में हैं। बीते 10 दिनों में उन्होंने 4 बार (15, 18, 22 और 25 अप्रैल) नीतीश कुमार से मुलाकात की। इसमें से एक बार नीतीश कुमार खुद सम्राट चौधरी के आवास पहुंचे। बाकी 3 बार सम्राट चौधरी उनसे मिलने 1, अणे मार्ग पहुंचे।

सम्राट चौधरी का नीतीश कुमार से बार-बार मिलना और महत्वपूर्ण फैसलों पर चर्चा करना यह दर्शाता है कि वे ‘नीतीश की छांव’ से पूरी तरह बाहर नहीं निकलना चाहते। नीतीश कुमार भले ही मुख्यमंत्री पद से हट गए हों, लेकिन सरकार की चाबी और अनुभवी अफसरों का रिमोट आज भी उनके अनुभव से जुड़ा है।

  1. पॉइंट में नीतीश की छांव से क्यों नहीं निकल पा रहे सम्राट
  2. नीतीश के वोट बैंक को नाराज नहीं करना है

सम्राट के नीतीश की छाया से बाहर नहीं निकलने का सबसे बड़ा कारण उनका वोट बैंक हैं। नीतीश कुमार का मुख्य वोट बैंक कुर्मी (उनकी जाति), महादलित, इबीसी और कुछ मुस्लिम-दलित समूहों में है।

16% से ज्यादा वोट बैंक हमेशा नीतीश कुमार के साथ रहा है। वह किसी भी पार्टी के साथ रहें, उनके वोटरों पर कोई फर्क नहीं पड़ता। फिलहाल बिहार में जेडीयू के 85 विधायक और 12 सांसद हैं।

नीतीश कुमार के जाने से उनके समर्थकों में नाराजगी खासकर कुर्मी, इबीसी और महिला वोट बैंक में अधिक है। इस नाराजगी को दूर करने के लिए ही भाजपा सहित जेडीयू के बड़े लीडर लगातार मुख्यमंत्री पद छोड़ने का निर्णय नीतीश कुमार के खुद का बता रहे हैं। सम्राट का नीतीश के प्रति प्रेम के पीछे भी यही कारण हो सकता है।

बताया जा रहा है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल नीतीश कुमार को नाराज करने के पक्ष में नहीं है। सम्राट चौधरी की अपनी कोई भी आक्रामक रणनीत नीतीश को महागठबंधन की ओर वापस धकेल सकती है, जो भाजपा के लिए 2029 में जोखिम भरा हो सकता है।

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  1. नीतीश कुमार की मजबूत सामाजिक-प्रशासनिक

नीतीश कुमार के पास 2 दशक का मुख्यमंत्री के रूप में अनुभव और राज्य के प्रशासन पर मजबूत पकड़ है। सम्राट चौधरी राजनीति में अनुभवी हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर वे 12 दिन पहले तक नीतीश के नेतृत्व वाले कैबिनेट का हिस्सा थे।

नीतीश कुमार अपनी कार्यशैली में किसी भी अन्य नेता को अपने बराबर का कद साझा करने देने के लिए नहीं जाने जाते थे। हालांकि, सम्राट के प्रति नीतीश कुमार ने जिस तरह स्नेह दर्शाया है, वैसे में वह अब बाहर रहकर सम्राट को प्रशासनिक रूप से मजबूत कर सकते हैं।

नीतीश कुमार की एक खासियत उनकी राज्य की बेहतर सामाजिक समझ भी रही है। सामाजिक और राजनीतिक रूप से जटिल बिहार में लंबे समय तक राजनीतिक पारी खेलने के लिए नीतीश जैसे तजुर्बे की जरूरत है। और यह तभी हासिल हो सकता है, जब उनके इर्द-गिर्द रहा जाए।

नीतीश की छाया में रहने के पीछे सम्राट चौधरी की एक स्ट्रेटजी यह भी हो सकती है। क्योंकि उनकी उम्र अभी 56 साल है और उनका अभी लंबा राजनीतिक करियर है।

अगर नीतीश की छाया से नहीं निकले तो क्या होगा

अगर सम्राट चौधरी इसी पुरानी लॉबी और नीतीश की नीतियों के सहारे चलते रहे, तो सवाल यह उठता है कि भाजपा का ‘अपना स्वतंत्र मॉडल’ क्या होगा? इसके नफा-नुकसान दोनों हैं।

फायदाः नीतीश कुमार की लकीरों पर चलने से सबसे बड़ा फायदा है कि सरकार में स्थिरता बनी रहेगी। काम चलता रहेगा। चूंकि नीतीश कुमार के साथ आने से एनडीए का राजनीतिक समीकरण ऐसा है कि विपक्ष को सत्ता में आने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।

भाजपा को सत्ता के लिए विपक्ष से कड़ी चुनौती मिलने की गुंजाइश कम है। हालांकि, युवाओं की बढ़ती आकांक्षाओं से आगे चलकर यह गणित गड़बड़ा भी सकता है।

नुकसानः सम्राट सरकार भी नीतीश मॉडल पर ही चली, कोई बदलाव नहीं हुआ तो भाजपा कार्यकर्ताओं और जनता के बीच संदेश जा सकता है कि केवल चेहरा बदला है, चाल-चरित्र और काम करने का तरीका अब मोटे तौर पर 3 तरह के नुकसान हो सकते हैं…

  1. टूट सकता है कोर वोटर

भाजपा का अपना एक वैचारिक आधार है। नीतीश मॉडल अक्सर ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है।

यदि सम्राट चौधरी अपनी आक्रामक राजनीति को छोड़कर केवल ‘नीतीश की सौम्यता’ को अपनाते हैं, तो उनका कोर वोटर (हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर जुड़ा वर्ग) भ्रमित हो सकता है।

भाजपा को विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अपने एजेंडे को इस तरह जोड़ना होगा कि वह नीतीश की नीतियों से अलग और ‘प्लस’ दिखे।

  1. तेज तरक्की की उम्मीद लगाए युवा नाराज हो सकते हैं

नीतीश मॉडल ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और ‘बुनियादी ढांचे (सड़क-बिजली)’ पर निर्भर रहा है। इसमें बड़ी इंडस्ट्री का अभाव रहा है।

अगर सम्राट चौधरी नई औद्योगिक नीति या विशेष निवेश क्षेत्र (सेज) नहीं लाते, तो युवा वर्ग जो ‘गुजरात या उत्तर प्रदेश मॉडल’ की उम्मीद कर रहा है, वह ठगा हुआ महसूस करेगा।

इसलिए भाजपा को ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और सिंगल विंडो क्लीयरेंस जैसे ठोस बदलाव लाने होंगे, ताकि बिहार केवल मजदूर देने वाला राज्य न रहकर ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ बने।

  1. मायूस हो सकता है भाजपा का कैडर

नीतीश कुमार के शासन में अफसरशाही के हावी होने के आरोप अक्सर लगते रहे हैं। भाजपा कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी शिकायत रही है कि उनकी सुनवाई नहीं होती।

पुरानी लॉबी के सहारे चलने का अर्थ है-वही अधिकारी और वही कार्यशैली। इससे भाजपा का कैडर हतोत्साहित हो सकता है।

सम्राट चौधरी को प्रशासन में राजनीतिक जवाबदेही तय करनी होगी, ताकि जनता को लगे कि अब निर्णय अफसर नहीं, बल्कि जनता के प्रतिनिधि ले रहे हैं।

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