संजय कुमार
बिहारशरीफ (अपना नालंदा)। प्राचीन भारतीय ज्ञान और बौद्धिक परंपरा के पुनर्जीवन की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल करते हुए नालंदा विश्वविद्यालय ने अपने तृतीय दीक्षांत समारोह के अवसर पर 17 और 18 मई 2026 को “शास्त्रार्थ 2026” का आयोजन शुरू किया है। इस विशेष आयोजन का उद्देश्य प्राचीन नालंदा महाविहार की उस गौरवशाली परंपरा को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से जोड़ना है, जिसमें तर्क, संवाद, चिंतन और ज्ञान-विमर्श को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।

विश्वविद्यालय ने पहली बार शास्त्रार्थ की ऐतिहासिक परंपरा को औपचारिक रूप से अपने शैक्षणिक कैलेंडर में शामिल किया है। इसके माध्यम से गुरु-शिष्य परंपरा की उस जीवंत संस्कृति को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें विद्यार्थी केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहकर अपने विचारों को तार्किक ढंग से प्रस्तुत करें और बौद्धिक विमर्श के माध्यम से ज्ञान को और अधिक समृद्ध बनाएं।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने अपने शोध-प्रबंधों का सार्वजनिक प्रतिरक्षण किया तथा विद्वानों के साथ गंभीर अकादमिक संवाद में भाग लिया। शास्त्रार्थ के विभिन्न सत्रों में तर्क, प्रमाण और वैचारिक आदान-प्रदान की समृद्ध परंपरा स्पष्ट रूप से देखने को मिली। विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि भारतीय चिंतन परंपरा में निहित सत्य की खोज और तार्किक संवाद की यह पद्धति आधुनिक शिक्षा को नई दिशा दे सकती है।
उद्घाटन समारोह की शुरुआत मंगल गान से हुई, जिसके बाद कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने अपने संबोधन में कहा कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह विचारों के संघर्ष, आत्मचिंतन और संवाद की प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि शिक्षा को पूरी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि वास्तविक बौद्धिक विकास गहन अध्ययन और विमर्श से ही संभव है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय ज्ञान परंपराओं ने सदैव नैतिकता, शासन और सार्वजनिक जीवन को एक-दूसरे से जुड़ा माना है। धर्म, अर्थ और नीति की भारतीय अवधारणा आज भी विश्व को समग्र दृष्टिकोण प्रदान करने की क्षमता रखती है।
“शास्त्रार्थ की परंपरा: इतिहास, व्यवहार और समकालीन प्रासंगिकता” विषय पर आयोजित विशेषज्ञ पैनल चर्चा में देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित विद्वानों ने भाग लिया। इनमें भारतीय दर्शन अनुसंधान परिषद के सदस्य सचिव प्रो. सच्चिदानंद मिश्रा, डॉ. मयंक शेखर मिश्रा, प्रो. असंग तिलकरत्ने, जैन विद्वान विशाल ताराचंद गड़ा, प्रो. गोदाबरिश मिश्रा तथा प्रो. डी. वेंकट राव शामिल रहे।
दो दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में बौद्ध अध्ययन, हिंदू अध्ययन, पुरातत्व, पारिस्थितिकी, साहित्य, दर्शन, अंतरराष्ट्रीय संबंध और सतत विकास जैसे विषयों पर कुल 23 शास्त्रार्थ सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष की पारंपरिक शैली पर आधारित ये सत्र विद्यार्थियों को तार्किक सोच, आलोचनात्मक दृष्टिकोण और सहयोगात्मक चिंतन के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
विश्वविद्यालय द्वारा इस अवसर पर ‘नालंदा शास्त्रार्थ सम्मान’ और ‘नालंदा शास्त्रार्थ पुरस्कार’ भी प्रदान किए जाएंगे। वहीं औपचारिक दीक्षांत समारोह 19 मई को आयोजित होगा, जिसमें विद्यार्थियों को प्राचीन नालंदा परंपरा की भावना के साथ उपाधियां प्रदान की जाएंगी।







