आलेख:-विजय कुमार जैन
(मंत्री-भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर दि. जैन समिति),महामंत्री-विद्वत् महासंघ
अक्षय तृतीया भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं में अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। जैन धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व है, क्योंकि इसका संबंध प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि अक्षय तृतीया का इतिहास प्राचीन तीर्थस्थल हस्तिनापुर से प्रारंभ हुआ, जहां भगवान ऋषभदेव को एक वर्ष के कठोर तप के बाद प्रथम आहार प्राप्त हुआ था। इसी घटना के कारण इस दिन को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना जाता है।
हस्तिनापुर एक प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी है, जिसका संबंध अनेक धार्मिक घटनाओं से रहा है। जैन परंपरा के अनुसार यहां भगवान शांतिनाथ, भगवान कुन्थुनाथ और भगवान अरहनाथ जैसे तीन तीर्थंकरों की जन्मभूमि भी है। इस कारण यह भूमि जैन श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है। इसके अलावा भगवान मल्लिनाथ का समवसरण भी हस्तिनापुर में हुआ था। कई ऐतिहासिक और धार्मिक परंपराएं इस भूमि से जुड़ी हुई हैं, जिससे इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
अक्षय तृतीया पर्व का संबंध विशेष रूप से भगवान ऋषभदेव से जुड़ा हुआ है। जैन धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान ऋषभदेव ने अयोध्या में जन्म लिया और प्रयाग की धरती पर दीक्षा ग्रहण की। वे वर्तमान कालचक्र के प्रथम तीर्थंकर माने जाते हैं। दीक्षा लेने के बाद उन्होंने कठोर तपस्या आरंभ की और लंबे समय तक ध्यान में लीन रहे। उनके साथ लगभग चार हजार राजाओं ने भी दीक्षा ग्रहण की थी।
दीक्षा के बाद भगवान ऋषभदेव जब आहार के लिए नगर-नगर भ्रमण करते थे, तब लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि जैन साधुओं को किस प्रकार आहार दिया जाता है। लोग श्रद्धा से उन्हें वस्त्र, आभूषण, धन या अन्य वस्तुएं अर्पित करना चाहते थे, लेकिन भगवान ऋषभदेव इन सबको स्वीकार नहीं करते थे। इस कारण लंबे समय तक उन्हें उचित आहार नहीं मिल सका और वे तपस्या में लीन रहे।
लगभग एक वर्ष बाद भगवान ऋषभदेव हस्तिनापुर पहुंचे। उस समय वहां राजा सोमप्रभ और उनके भाई राजकुमार श्रेयांस का शासन था। कथा के अनुसार एक रात पूर्व राजकुमार श्रेयांस को कई शुभ स्वप्न दिखाई दिए, जिनमें सुमेरु पर्वत, कल्पवृक्ष, सिंह, बैल, सूर्य, चंद्रमा और समुद्र जैसे प्रतीक दिखाई पड़े। इन स्वप्नों का अर्थ यह था कि कोई महान पुरुष उस भूमि पर आने वाला है।
जब भगवान ऋषभदेव हस्तिनापुर पहुंचे और राजकुमार श्रेयांस ने उनका दर्शन किया, तब उन्हें पूर्व जन्म का स्मरण हो गया। उन्हें याद आया कि जैन साधु को किस प्रकार आहार दिया जाता है। उन्होंने अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान ऋषभदेव को गन्ने के रस का आहार अर्पित किया। यह जैन परंपरा में प्रथम आहार माना जाता है।
कहा जाता है कि जैसे ही भगवान ऋषभदेव ने आहार ग्रहण किया, उसी क्षण देवताओं ने आकाश से रत्नों और पुष्पों की वर्षा की और वातावरण जय-जयकार से गूंज उठा। उस दिन वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी, जिसे बाद में अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाने लगा। ‘अक्षय’ का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो। मान्यता है कि इस दिन किए गए पुण्य कार्यों का फल अक्षय होता है।

जैन श्रद्धालु आज भी इस पवित्र परंपरा को बड़ी श्रद्धा के साथ निभाते हैं। देश और विदेश में रहने वाले जैन समुदाय के लोग अक्षय तृतीया के अवसर पर उपवास और तपस्या करते हैं। कई श्रद्धालु वर्षीतप जैसे कठोर व्रत भी रखते हैं, जिसमें पूरे वर्ष विशेष तपस्या की जाती है और अक्षय तृतीया के दिन उसका पारणा किया जाता है।
हस्तिनापुर में इस अवसर पर विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और गन्ने के रस से पारणा करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है। श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों और भक्ति गीतों के साथ तपस्वियों का सम्मान करते हैं और उन्हें गन्ने का रस पिलाकर पारणा कराते हैं।
जैन परंपरा में दान का भी विशेष महत्व है। कहा जाता है कि राजा श्रेयांस द्वारा भगवान ऋषभदेव को आहार देने के साथ ही दान की परंपरा का प्रारंभ हुआ था। इसी कारण उन्हें दान तीर्थ प्रवर्तक की उपाधि भी दी गई। बाद में भरत चक्रवर्ती ने अयोध्या से आकर राजा श्रेयांस का सम्मान किया और इस घटना को महान धार्मिक उपलब्धि माना।
अक्षय तृतीया को मांगलिक कार्यों के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन विवाह, गृह प्रवेश और अन्य धार्मिक कार्य बिना मुहूर्त देखे भी किए जाते हैं। लोगों का विश्वास है कि इस दिन आरंभ किया गया कोई भी कार्य दीर्घकाल तक फलदायी होता है।
हस्तिनापुर स्थित जम्बूद्वीप परिसर में जैन समाज की प्रेरणा से आहार महल का निर्माण भी किया गया है, जहां भगवान ऋषभदेव और राजा श्रेयांस की प्रतिमाएं स्थापित हैं। यहां हर वर्ष अक्षय तृतीया के अवसर पर विशेष पूजा और आहार दान का आयोजन होता है।
इस प्रकार अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि दान, तपस्या और आध्यात्मिक साधना की प्रेरणा देने वाला पावन अवसर है। हस्तिनापुर से जुड़ी यह परंपरा आज भी जैन श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति का प्रतीक बनी हुई है।






