खान सर विवाद के बाद बड़ा सवाल, शिक्षा या कारोबार की जंग?

Written by Sanjay Kumar

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लेखक : वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया
बिहार की राजधानी पटना को लंबे समय से शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता रहा है। राज्य ही नहीं, बल्कि झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, नेपाल और देश के कई हिस्सों से हजारों छात्र हर वर्ष यहां पहुंचते हैं। माता-पिता अपनी वर्षों की बचत खर्च कर बच्चों को इस उम्मीद के साथ पटना भेजते हैं कि वे पढ़-लिखकर अपने सपनों को साकार करेंगे। लेकिन हाल के दिनों में पटना के कोचिंग जगत से जो तस्वीर सामने आ रही है, उसने शिक्षा व्यवस्था और समाज दोनों के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


मशहूर शिक्षक खान सर के कोचिंग संस्थान से जुड़ा विवाद, कथित हमला, पत्थरबाजी और उसके बाद सामने आई राजनीतिक तथा सामाजिक प्रतिक्रियाओं ने यह बहस तेज कर दी है कि आखिर शिक्षा के केंद्रों में ऐसा माहौल क्यों बन रहा है। यह मामला केवल किसी एक शिक्षक या कोचिंग संस्थान का नहीं है, बल्कि पूरे शैक्षणिक वातावरण, कोचिंग संस्कृति और शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण का प्रतीक बन गया है।

"How long will the economy survive on litchis and makhanas? Small businesses are demanding answers from the Bihar government." "Tourism has increased, but employment hasn't! Jansuraj poses significant questions to the government."


सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि शिक्षा के केंद्र ही तनाव, संघर्ष और शक्ति प्रदर्शन का मंच बन जाएं तो छात्रों को क्या संदेश मिलेगा? छात्र अपने शिक्षकों को आदर्श मानते हैं। वे उनसे केवल पाठ्यक्रम ही नहीं सीखते, बल्कि जीवन जीने का तरीका, सामाजिक व्यवहार और नैतिक मूल्यों की भी प्रेरणा लेते हैं। ऐसे में यदि शिक्षक और कोचिंग संस्थान विवादों के केंद्र में दिखाई दें, तो इसका असर सीधे छात्रों की सोच और मानसिकता पर पड़ता है।
पिछले एक दशक में पटना का कोचिंग उद्योग तेजी से विकसित हुआ है। आज यह केवल शिक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि हजारों करोड़ रुपये के कारोबार का रूप ले चुका है। शहर के राजेंद्र नगर, मुसल्लहपुर हाट, बोरिंग रोड, कंकड़बाग और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कोचिंग संस्थान संचालित हो रहे हैं। हर संस्थान बेहतर परिणाम और अधिक छात्रों को आकर्षित करने की होड़ में लगा है। इस प्रतिस्पर्धा ने शिक्षा के क्षेत्र में नए अवसर तो पैदा किए हैं, लेकिन साथ ही कई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं।
आज अधिकांश कोचिंग संस्थानों की पहचान उनके परिणाम, प्रचार और ब्रांडिंग से तय होती है। बड़े-बड़े विज्ञापन, सोशल मीडिया प्रचार और सफलता की कहानियां छात्रों को आकर्षित करने का प्रमुख माध्यम बन गए हैं। शिक्षा का यह बाजारीकरण कई बार स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की सीमा पार कर कटुता और वर्चस्व की लड़ाई में बदलता दिखाई देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब शिक्षा सेवा से अधिक व्यापार का रूप लेने लगती है, तब ऐसे विवादों की संभावना बढ़ जाती है।
खान सर की लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। लाखों छात्र उन्हें एक प्रभावशाली शिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं। डिजिटल मंचों से लेकर ऑफलाइन कक्षाओं तक उनकी पहुंच व्यापक है। ऐसे में उनके संस्थान से जुड़ी किसी भी घटना का प्रभाव केवल एक परिसर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देशभर के छात्रों और अभिभावकों तक पहुंचता है। इसलिए इस प्रकार की घटनाएं शिक्षा जगत की छवि को भी प्रभावित करती हैं।
हालांकि मामले की जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगा, लेकिन यह घटना इस बात का संकेत अवश्य देती है कि शिक्षा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का स्वरूप बदल रहा है। चिंता की बात यह है कि यह प्रतिस्पर्धा कई बार सहयोग और शैक्षणिक गुणवत्ता के बजाय वर्चस्व और प्रभाव की लड़ाई में बदलती नजर आती है।
कुछ समय पहले ही एक मीडिया विवाद को लेकर देशभर के कई शिक्षकों ने एकजुट होकर अपनी राय रखी थी। उस समय ऐसा लगा था कि शिक्षा जगत सामाजिक मुद्दों पर एक स्वर में खड़ा है। लेकिन इसके तुरंत बाद कोचिंग संस्थानों के बीच विवाद और तनाव की खबरों ने एक अलग तस्वीर प्रस्तुत कर दी। यह विरोधाभास छात्रों को भ्रमित करता है और शिक्षक की पारंपरिक छवि पर भी असर डालता है।
समाज में शिक्षक का स्थान हमेशा सम्मान और विश्वास का रहा है। भारतीय परंपरा में गुरु को ज्ञान का प्रकाश देने वाला माना गया है। नालंदा और विक्रमशिला जैसी ऐतिहासिक शिक्षण परंपराओं वाले बिहार में यह जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि शिक्षा के केंद्रों में संघर्ष, आरोप-प्रत्यारोप और शक्ति प्रदर्शन की घटनाएं बढ़ती हैं, तो इसका नकारात्मक प्रभाव केवल संस्थानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समाज पर पड़ेगा।
इस पूरे मामले में सरकार और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। क्या प्रशासन के पास ऐसा कोई तंत्र है जो कोचिंग संस्थानों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और संभावित तनाव पर नजर रख सके? क्या उन क्षेत्रों में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था है जहां प्रतिदिन हजारों छात्र आते-जाते हैं? क्या शिक्षा के तेजी से बढ़ते निजीकरण और व्यावसायीकरण को नियंत्रित करने के लिए कोई स्पष्ट नीति मौजूद है? ये ऐसे सवाल हैं जिन पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।
पटना पहले से ही देश के प्रमुख शैक्षणिक केंद्रों से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। कोटा, दिल्ली, प्रयागराज और अन्य शहर छात्रों को आकर्षित करने के लिए लगातार अपनी सुविधाएं और शैक्षणिक वातावरण बेहतर बना रहे हैं। यदि पटना की छवि विवादों और असुरक्षा से जुड़ने लगेगी, तो इसका सीधा असर यहां आने वाले छात्रों की संख्या और बिहार की शैक्षणिक प्रतिष्ठा पर पड़ सकता है।
यह भी समझना जरूरी है कि कोचिंग संस्थान विद्यालयों और विश्वविद्यालयों का विकल्प नहीं हैं। उनका उद्देश्य छात्रों को अतिरिक्त शैक्षणिक सहयोग प्रदान करना है। लेकिन वर्तमान समय में कई जगहों पर पूरी शिक्षा व्यवस्था कोचिंग संस्कृति के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि शिक्षा को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में भी देखा जाए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षक, कोचिंग संचालक, अभिभावक, प्रशासन और सरकार सभी मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करें जहां प्रतिस्पर्धा तो हो, लेकिन स्वस्थ हो। जहां संस्थानों के बीच मुकाबला गुणवत्ता और परिणामों का हो, न कि शक्ति प्रदर्शन और विवादों का। शिक्षा के केंद्रों में संवाद, अनुशासन और सहयोग की संस्कृति विकसित करनी होगी।
बिहार की पहचान केवल राजनीतिक गतिविधियों से नहीं, बल्कि उसकी गौरवशाली शैक्षणिक विरासत से भी है। नालंदा की धरती से दुनिया को ज्ञान का संदेश मिला है। इसलिए यह जरूरी है कि आधुनिक शिक्षा केंद्र भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाएं। शिक्षा के मंदिरों में पत्थर नहीं, विचार चलें; टकराव नहीं, संवाद हो; और प्रतिस्पर्धा नहीं, ज्ञान सर्वोच्च बने। क्योंकि जिस दिन छात्र यह मानने लगेंगे कि सफलता का रास्ता संवाद के बजाय संघर्ष से होकर जाता है, उस दिन केवल शिक्षा व्यवस्था ही नहीं, पूरा समाज हार जाएगा।

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