- फायरिंग, विवाद और प्रचार के शोर में कहीं खो तो नहीं रहा छात्रों का भविष्य?
- जब शिक्षक ब्रांड बन जाएं और छात्र दर्शक, तब शिक्षा व्यवस्था को आईना दिखाने का समय आ जाता है
लेखक: वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया
बिहार की राजधानी पटना लंबे समय से देश के प्रमुख शैक्षणिक केंद्रों में गिनी जाती रही है। यहां की गलियों से निकलकर हजारों छात्र प्रशासनिक सेवाओं, इंजीनियरिंग, चिकित्सा और अन्य प्रतिष्ठित क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाते रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में जिस प्रकार कोचिंग संस्थानों से जुड़े विवाद, आरोप-प्रत्यारोप, शक्ति प्रदर्शन, सुरक्षा को लेकर सवाल और फायरिंग जैसी घटनाएं चर्चा का विषय बनी हैं, उन्होंने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या हम शिक्षा की बात कर रहे हैं या शिक्षा के नाम पर बन रहे प्रभाव, प्रतिष्ठा और वर्चस्व के साम्राज्य की?
यह प्रश्न किसी एक शिक्षक, किसी एक कोचिंग संस्थान या किसी एक घटना तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश में तेजी से फैल रही उस कोचिंग संस्कृति का सवाल है, जिसने शिक्षा को एक बड़े उद्योग में बदल दिया है। जहां कभी शिक्षक की पहचान उसके ज्ञान, अनुशासन और छात्रों की सफलता से होती थी, वहीं आज कई मामलों में पहचान सोशल मीडिया फॉलोअर्स, वायरल वीडियो, प्रचार अभियानों और संस्थागत ब्रांडिंग से तय होने लगी है।शिक्षा का मूल उद्देश्य छात्रों को ज्ञान, विवेक और बेहतर नागरिकता की ओर ले जाना है। लेकिन जब शिक्षा संस्थानों का नाम पढ़ाई से अधिक विवादों के कारण सुर्खियों में आने लगे, तब यह चिंता स्वाभाविक हो जाती है कि कहीं शिक्षा का मूल उद्देश्य पीछे तो नहीं छूट रहा।
आज का छात्र पहले से अधिक दबाव में है। प्रतियोगी परीक्षाओं की कठिन चुनौती, बढ़ती बेरोजगारी, आर्थिक दबाव और सामाजिक अपेक्षाएं पहले ही उसके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे समय में यदि शिक्षा संस्थानों का वातावरण विवाद, संघर्ष और असुरक्षा से घिरा दिखाई दे, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उसी छात्र को होता है जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए घर-परिवार से दूर संघर्ष कर रहा है।एक समय था जब शिक्षक को समाज में गुरु का दर्जा प्राप्त था। गुरु केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता था, बल्कि चरित्र निर्माण और सामाजिक मूल्यों का भी वाहक होता था। आज भी लाखों शिक्षक इस परंपरा को निभा रहे हैं। लेकिन कुछ मामलों में जिस प्रकार शिक्षण संस्थान व्यक्तित्व आधारित प्रचार और प्रतिस्पर्धी वर्चस्व की राजनीति में उलझते दिखाई देते हैं, वह शिक्षा जगत के लिए चिंताजनक संकेत है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या किसी शिक्षक की लोकप्रियता उसके ज्ञान से तय होनी चाहिए या उसके प्रचार तंत्र से? क्या किसी संस्थान की सफलता का पैमाना उसके चयनित छात्रों की संख्या होनी चाहिए या सोशल मीडिया पर उसकी पहुंच? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या छात्र शिक्षा प्राप्त करने आया है या किसी ब्रांड का समर्थक बनने?यह भी देखने में आया है कि कई बार शिक्षा से जुड़े मंचों पर वैचारिक, धार्मिक या राजनीतिक विमर्श इस प्रकार हावी हो जाते हैं कि पढ़ाई का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। लोकतंत्र में विचारों की स्वतंत्रता आवश्यक है, लेकिन कक्षा का प्राथमिक उद्देश्य ज्ञान होना चाहिए, न कि वैचारिक ध्रुवीकरण। छात्र को वैज्ञानिक सोच, तार्किक दृष्टिकोण और संवैधानिक मूल्यों की शिक्षा मिलनी चाहिए। उसे किसी भी प्रकार के अंधानुकरण की ओर नहीं धकेला जाना चाहिए।
कोचिंग उद्योग की बढ़ती ताकत के बीच सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। करोड़ों और अरबों रुपये के इस क्षेत्र में लाखों छात्र जुड़े हुए हैं, लेकिन नियमन की स्थिति आज भी कमजोर दिखाई देती है। अधिकांश कार्रवाई तब होती है जब कोई बड़ा विवाद सामने आता है। प्रश्न यह है कि क्या व्यवस्था का काम केवल संकट आने के बाद सक्रिय होना है? क्या ऐसे तंत्र विकसित नहीं किए जा सकते जो विवादों को जन्म लेने से पहले ही रोक सकें?
देश के कई हिस्सों में कोचिंग संस्थानों को लेकर सुरक्षा, फीस, भ्रामक विज्ञापन, छात्र तनाव और अवसंरचना से जुड़े सवाल लगातार उठते रहे हैं। इसके बावजूद एक व्यापक और प्रभावी नियामक ढांचा अभी भी मजबूत रूप में दिखाई नहीं देता। यदि स्कूलों, विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों के लिए नियम हो सकते हैं, तो कोचिंग संस्थानों के लिए भी स्पष्ट और कठोर नियम क्यों नहीं होने चाहिए?
सरकार को चाहिए कि वह कोचिंग संस्थानों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत नियामक ढांचा तैयार करे। इसमें सुरक्षा मानकों को अनिवार्य बनाया जाए। शिक्षकों और संस्थानों के लिए आचार संहिता लागू की जाए। भ्रामक विज्ञापनों पर कठोर कार्रवाई हो। छात्रों की शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए स्वतंत्र व्यवस्था बनाई जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि शिक्षासंस्थानों में किसी प्रकार का भय, दबाव या असुरक्षा का वातावरण न बने।लेकिन केवल सरकार को दोष देकर समस्या का समाधान नहीं होगा। समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। अभिभावकों को यह समझना होगा कि लोकप्रियता और गुणवत्ता हमेशा एक ही चीज नहीं होती। चमकदार प्रचार, बड़े-बड़े दावे और सोशल मीडिया की लोकप्रियता के पीछे भागने के बजाय संस्थानों की वास्तविक शैक्षणिक गुणवत्ता को महत्व देना होगा।
शिक्षकों को भी यह याद रखना होगा कि उनका प्रभाव केवल कक्षा तक सीमित नहीं होता। लाखों युवा उन्हें आदर्श मानते हैं। उनके शब्द, व्यवहार और सार्वजनिक आचरण छात्रों के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालते हैं। इसलिए शिक्षक की गरिमा केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके संयम, जिम्मेदारी और नैतिक आचरण से भी निर्धारित होती है।आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को फिर से केंद्र में लाया जाए। चर्चा इस बात पर हो कि छात्रों को बेहतर पुस्तकालय कैसे मिलें, बेहतर शिक्षक कैसे मिलें, मानसिक स्वास्थ्य सहायता कैसे उपलब्ध हो, रोजगारोन्मुखी शिक्षा कैसे विकसित हो और ग्रामीण तथा गरीब पृष्ठभूमि के छात्रों को समान अवसर कैसे प्राप्त हों। दुर्भाग्य तब होता है जब इन सवालों की जगह विवाद, टकराव और प्रचार सुर्खियों में आ जाते हैं।
भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। आने वाले वर्षों में देश की दिशा और दशा आज के छात्रों के हाथों में होगी। यदि शिक्षा का वातावरण स्वस्थ, सुरक्षित और ज्ञान आधारित होगा तो देश मजबूत होगा। लेकिन यदि शिक्षा बाजार, ब्रांड, टकराव और व्यक्तिवाद के बीच उलझती गई तो इसका खामियाजा केवल छात्रों को नहीं, पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा।
आज जरूरत किसी व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध की नहीं है। जरूरत शिक्षा व्यवस्था के मूल प्रश्नों पर गंभीर बहस की है। जरूरत यह तय करने की है कि शिक्षा का केंद्र कौन होगा—छात्र या संस्थान? ज्ञान या प्रचार? मूल्य या बाजार?अंततः देश का भविष्य किसी एक शिक्षक, किसी एक कोचिंग संस्थान या किसी एक विवाद से तय नहीं होगा। देश का भविष्य उस छात्र से तय होगा जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है। इसलिए हर नीति, हर व्यवस्था और हर बहस का केंद्र वही छात्र होना चाहिए।
क्योंकि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य भी वही है और राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी आशा भी वही।आज समय का सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या हम शिक्षा को शिक्षा रहने देंगे, या उसे बाजार, ब्रांड और वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा में खो जाने देंगे? इस प्रश्न का उत्तर केवल सरकार, शिक्षक या संस्थान नहीं देंगे। इसका उत्तर पूरा समाज देगा, और वही उत्तर भारत की आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय करेगा।






