पटना (अपना नालंदा)। देश में लगातार बढ़ती महंगाई अब आम आदमी के लिए सबसे बड़ी चिंता बनती जा रही है। बाजार में रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों में लगातार वृद्धि होने से मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों का बजट पूरी तरह बिगड़ चुका है। रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल, दूध, दाल, सब्जी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक की बढ़ती कीमतों ने लोगों की जिंदगी मुश्किल कर दी है। समाजसेवी चंदन चौरसिया ने कहा कि बढ़ती महंगाई ने आम लोगों की कमर तोड़ दी है और परिवार अब खर्चों को नियंत्रित करने के लिए अपनी जरूरतों में कटौती करने को मजबूर हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि महंगाई अब केवल आर्थिक आंकड़ों का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह हर घर और हर परिवार की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। पहले जितने पैसे में महीनेभर का राशन और जरूरी सामान आ जाता था, अब उतने पैसे में आधा सामान भी मुश्किल से मिल पा रहा है। सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ रहा है, जिनकी आमदनी स्थिर है लेकिन खर्च लगातार बढ़ रहे हैं।
महंगाई का सबसे बड़ा असर रसोई पर दिखाई दे रहा है। टमाटर, प्याज, आलू जैसी सामान्य सब्जियों के दाम कई बार इतने बढ़ जाते हैं कि लोग खरीदने से पहले कई बार सोचने लगते हैं। खाने का तेल, दाल, मसाले और दूध जैसे आवश्यक सामानों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत ने महिलाओं के लिए घर चलाना कठिन बना दिया है। गांवों में कई परिवार अब भी लकड़ी और चूल्हे का सहारा लेने को मजबूर हैं।
चंदन चौरसिया ने कहा कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने से हर वस्तु महंगी हो जाती है। ईंधन महंगा होने पर माल ढुलाई की लागत बढ़ती है, जिसका असर सीधे बाजार पर पड़ता है। सब्जी, फल, निर्माण सामग्री, दवा और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं। आम लोग लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि ईंधन पर करों में कमी क्यों नहीं की जाती।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। सरकार लगातार हालात नियंत्रण में होने का दावा करती है, लेकिन आम लोगों की परेशानी कम नहीं हो रही है। बाजार में खरीदारी करने वाला हर व्यक्ति महंगाई का असर महसूस कर रहा है।
महंगाई का असर शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र पर भी तेजी से बढ़ा है। निजी स्कूलों की फीस, किताबें, कोचिंग और ऑनलाइन शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ रहा है। मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बच्चों की पढ़ाई कराना कठिन होता जा रहा है। वहीं निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च इतना अधिक हो चुका है कि कई परिवार कर्ज लेने को मजबूर हैं। दवाइयों की बढ़ती कीमतों ने बुजुर्गों और गंभीर बीमार मरीजों की परेशानी और बढ़ा दी है।
मध्यम वर्ग की स्थिति सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। यह वह वर्ग है जो न तो पूरी तरह सरकारी योजनाओं का लाभ ले पाता है और न ही बढ़ती महंगाई का आसानी से सामना कर सकता है। नौकरीपेशा लोगों की सैलरी सीमित है, लेकिन खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं। बिजली बिल, गैस, किराना, बच्चों की फीस, यात्रा खर्च और ईएमआई ने परिवारों की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया है।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी हालात बेहतर नहीं हैं। खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। खाद, बीज, डीजल और कृषि उपकरण महंगे हो चुके हैं। किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा, जबकि उत्पादन लागत बढ़ती जा रही है। मजदूर वर्ग को रोजगार तो मिल रहा है, लेकिन मजदूरी के मुकाबले महंगाई की रफ्तार कहीं अधिक तेज है।
चंदन चौरसिया ने कहा कि बढ़ती महंगाई का सामाजिक प्रभाव भी गंभीर होता जा रहा है। परिवारों में तनाव बढ़ रहा है। लोग अपनी इच्छाओं और जरूरतों में कटौती करने लगे हैं। त्योहारों पर खरीदारी कम हो रही है और छोटे दुकानदारों की बिक्री प्रभावित हो रही है। लोग अब केवल जरूरी सामान खरीदने पर ध्यान दे रहे हैं।
युवाओं के सामने भी दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। एक ओर रोजगार की कमी है तो दूसरी ओर लगातार बढ़ती महंगाई। पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी नहीं मिलने और शहरों में बढ़ते किराए, भोजन तथा यात्रा खर्च ने युवाओं की परेशानियां बढ़ा दी हैं। कई युवा मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं।
महिलाएं घर का बजट संभालने में सबसे ज्यादा संघर्ष कर रही हैं। पहले जहां एक निश्चित राशि में महीनेभर का राशन आ जाता था, अब उसी राशि में बहुत कम सामान मिल रहा है। कई परिवारों ने दूध, फल और पोषण से जुड़ी चीजों में कटौती शुरू कर दी है, जिसका असर बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
सरकार द्वारा मुफ्त राशन योजना, उज्ज्वला योजना, किसानों को आर्थिक सहायता और अन्य सब्सिडी योजनाओं के जरिए राहत देने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि आम लोगों का कहना है कि राहत योजनाओं के बावजूद रोजमर्रा का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। विपक्ष भी महंगाई को लेकर लगातार सरकार पर हमला बोल रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई पर नियंत्रण के लिए दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता है। कृषि उत्पादन बढ़ाने, रोजगार सृजन, ईंधन नीति में सुधार और घरेलू उद्योगों को मजबूत करने से स्थिति में सुधार हो सकता है। साथ ही जमाखोरी और कालाबाजारी पर सख्ती जरूरी है ताकि बाजार में कृत्रिम संकट पैदा न हो।
आज आम आदमी हर दिन खर्चों का हिसाब लगाकर जिंदगी जीने को मजबूर है। परिवार अपनी इच्छाओं को सीमित कर केवल जरूरतों तक सिमटते जा रहे हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में महंगाई का संकट और गंभीर हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि सरकार, बाजार और समाज मिलकर ऐसा समाधान तलाशें जिससे आम लोगों को वास्तविक राहत मिल सके।







