नालंदा विश्वविद्यालय के भव्य दीक्षांत समारोह में वैश्विक शिक्षा और जिम्मेदार ज्ञान का संदेश गूंजा, 14 देशों के विद्यार्थियों को मिली उपाधि

Written by Sanjay Kumar

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संजय कुमार
बिहारशरीफ (अपना नालंदा)। ऐतिहासिक नालंदा विश्वविद्यालय एक बार फिर वैश्विक शिक्षा और बौद्धिक विमर्श का केंद्र बनकर उभरा, जब विश्वविद्यालय का तृतीय दीक्षांत समारोह भव्यता और गरिमामय माहौल में सम्पन्न हुआ। विश्वविद्यालय परिसर स्थित नव-निर्मित 2000 सीटों वाले ‘विश्वामित्रालय’ सभागार में आयोजित इस समारोह में भारत सहित कई देशों के शिक्षाविद्, नीति निर्माता और विद्यार्थी शामिल हुए। कार्यक्रम ने न केवल नालंदा विश्वविद्यालय की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय पहचान को प्रदर्शित किया, बल्कि “जिम्मेदार ज्ञान” और वैश्विक सहभागिता की नई अवधारणा को भी मजबूती से सामने रखा।
समारोह में भारत के प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त) की विशेष उपस्थिति ने कार्यक्रम को और गरिमामय बना दिया। वहीं विदेश मंत्रालय के सचिव (ईस्ट) रुद्रेंद्र टंडन विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस अवसर पर विदेश मंत्रालय के नालंदा प्रभाग की संयुक्त सचिव अर्चना नायर, विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, शिक्षाविद् और अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे।
दीक्षांत समारोह में 14 देशों के कुल 219 विद्यार्थियों को डिग्रियां प्रदान की गईं। इनमें भारत के अलावा वियतनाम, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार सहित कई देशों के छात्र-छात्राएं शामिल थे। समारोह में शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए 08 विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान किए गए, जिनमें 07 छात्राएं शामिल रहीं। यह उपलब्धि महिला शिक्षा और अकादमिक क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी का भी प्रतीक बनी।


समारोह के बाद मुख्य अतिथि डॉ. पी.के. मिश्रा ने विश्वविद्यालय परिसर में ‘कौटिल्य सेंटर फॉर कैपेसिटी बिल्डिंग’ का उद्घाटन किया। इस केंद्र को प्रशासनिक, बौद्धिक और नेतृत्व क्षमता विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
अपने संबोधन में डॉ. मिश्रा ने कहा कि नालंदा केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत विरासत और ज्ञान परंपरा का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि आज दुनिया तकनीकी रूप से अत्यधिक विकसित हो चुकी है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ज्ञान को विवेक, नैतिकता, करुणा और मानवीय उत्तरदायित्व से जोड़े रखा जाए। उन्होंने कहा, “नालंदा की कहानी सिर्फ अतीत की नहीं, बल्कि भविष्य की भी कहानी है।”


डॉ. मिश्रा ने कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरुद्धार भारत की उस मूल भावना को दर्शाता है, जिसमें बहुलतावाद, संवाद, उदारता और जिज्ञासा को मानवता के भविष्य के लिए आवश्यक माना गया है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे केवल डिग्री हासिल करने तक सीमित न रहें, बल्कि समाज और मानवता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी समझें।
बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने अपने संबोधन में नालंदा को “सभ्यतागत पारिस्थितिकी तंत्र” बताया। उन्होंने कहा कि प्राचीन नालंदा ने भारत को एशिया के विभिन्न देशों से ज्ञान, विचार और आध्यात्मिक विमर्श के माध्यम से जोड़ा था। उन्होंने कहा कि नालंदा का पुनरुत्थान किसी भवन का पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि एक महान सभ्यतागत विचार की पुनर्प्राप्ति है।
राज्यपाल ने “नालंदा कॉरिडोर” की अवधारणा का जिक्र करते हुए कहा कि नालंदा, बोधगया, राजगीर, वैशाली और विक्रमशिला को जोड़ने वाला यह सांस्कृतिक क्षेत्र ज्ञान, नैतिकता और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि नया नालंदा विश्वविद्यालय मानवता की विवेक-खोज का केंद्र बनना चाहिए।


इस अवसर पर कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय अब अधिक सुदृढ़ीकरण और तीव्र प्रगति के दौर में प्रवेश कर चुका है। उन्होंने घोषणा की कि आगामी शैक्षणिक सत्र से साइंस एंड टेक्नोलॉजी पॉलिसी स्टडीज, डाटा साइंस एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नए पाठ्यक्रम शुरू किए जाएंगे। साथ ही अगस्त 2026 से “नालंदा स्पिरिट” नामक विशेष पाठ्यक्रम भी आरंभ होगा।
प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि नालंदा केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत भावना है, जो वैश्विक संवाद, पर्यावरणीय चिंतन, एशियाई ज्ञान परंपरा और तुलनात्मक सभ्यता अध्ययन को नई दिशा दे रही है।
समारोह का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि नालंदा विश्वविद्यालय 21वीं सदी में ज्ञान, संवाद, सतत विकास और जिम्मेदार बौद्धिक नेतृत्व का वैश्विक केंद्र बनकर उभरेगा।

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