राजगीर मलमास मेले का काला सच : थिएटर में संस्कृति की जगह अश्लीलता का कब्जा

Written by Sanjay Kumar

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संजय कुमार
बिहारशरीफ (अपना नालंदा)। बिहार की ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी राजगीर सदियों से अपनी आध्यात्मिक परंपराओं, ऐतिहासिक धरोहरों और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए प्रसिद्ध रही है। यहां लगने वाला मलमास मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोक संस्कृति, कला, संगीत और सामाजिक जीवन का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। हर तीन वर्ष पर लगने वाला यह मेला देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनता रहा है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि मलमास मेले के दौरान राजगीर में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है। इसी आस्था के कारण लाखों श्रद्धालु इस अवधि में राजगीर पहुंचकर विभिन्न कुंडों में स्नान, पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।


लेकिन समय के साथ इस मेले की सांस्कृतिक पहचान में बड़ा बदलाव आया है। एक समय था जब मलमास मेले में लगने वाला थिएटर लोगों के मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम हुआ करता था। थिएटर केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला मंच था। वहां प्रस्तुत नाटक सामाजिक कुरीतियों, पारिवारिक मूल्यों, देशभक्ति, प्रेम, त्याग और नैतिकता जैसे विषयों पर आधारित होते थे। गांव से लेकर शहर तक के लोग रातभर बैठकर नाटक देखते थे। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और युवा सभी वर्ग के लोग थिएटर का आनंद लेते थे। लेकिन आज वही थिएटर अपनी मूल पहचान खोता जा रहा है।
करीब दो दशक पहले तक राजगीर के मलमास मेले में थिएटर का अलग ही महत्व हुआ करता था। मेले में एक महीने तक प्रतिदिन अलग-अलग नाटक खेले जाते थे। कलाकार अपनी अभिनय कला से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। उस समय थिएटर में पारिवारिक माहौल होता था। लोग पूरे परिवार के साथ नाटक देखने पहुंचते थे। मंच पर कलाकारों की संवाद शैली, संगीत, भाव-भंगिमा और सामाजिक संदेश लोगों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ते थे। कई नाटक ऐसे होते थे जिन्हें देखने के बाद लोग घंटों तक उसकी चर्चा करते थे।

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उस दौर में थिएटर केवल व्यवसाय नहीं था, बल्कि कला और संस्कृति का जीवंत उदाहरण था। स्थानीय कलाकारों को मंच मिलता था। लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक प्रस्तुतियों को बढ़ावा मिलता था। सामाजिक जागरूकता फैलाने में भी थिएटर की बड़ी भूमिका थी। दहेज प्रथा, बाल विवाह, शराबबंदी, शिक्षा और महिला सम्मान जैसे विषयों पर आधारित नाटक समाज को सोचने पर मजबूर कर देते थे।
धीरे-धीरे समय बदला और थिएटर का स्वरूप भी बदलने लगा। आधुनिकता और बाजारवाद की दौड़ में थिएटर की आत्मा कहीं खो गई। अब नाटक की जगह रिकॉर्डेड गानों पर डांस ने ले ली। अभिनय और संवाद की जगह तेज आवाज वाले संगीत और भड़काऊ प्रस्तुतियां होने लगीं। दर्शकों को आकर्षित करने के नाम पर मंच पर अश्लीलता परोसी जाने लगी। छोटे कपड़ों और उत्तेजक नृत्य को मनोरंजन का साधन बना दिया गया।
स्थिति यहां तक पहुंच गई कि कई बार मंच पर नग्नता जैसी घटनाएं भी सामने आने लगीं। इसका असर समाज पर भी पड़ा। परिवार के साथ थिएटर देखने जाने की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। महिलाएं और बुजुर्ग थिएटर से दूरी बनाने लगे। जिस मंच पर कभी सामाजिक संदेश दिए जाते थे, वहां अब केवल सस्ते मनोरंजन का प्रदर्शन होने लगा।

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मेले में आने वाले श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने कई बार इस पर चिंता जताई। धार्मिक नगरी राजगीर की सांस्कृतिक गरिमा को ठेस पहुंचने लगी। लोगों का कहना था कि जहां एक ओर मलमास मेले में करोड़ों देवी-देवताओं के वास की मान्यता है, वहीं दूसरी ओर उसी मेले में अश्लीलता का प्रदर्शन बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
लगातार बढ़ती शिकायतों के बाद जिला प्रशासन को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। थिएटर परिसरों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने लगे। प्रशासन की निगरानी बढ़ाई गई ताकि अश्लील कार्यक्रमों पर रोक लगाई जा सके। कई बार आयोजकों को चेतावनी भी दी गई। इसका असर कुछ हद तक दिखाई दिया और खुलेआम अश्लील प्रदर्शन पर नियंत्रण लगा।
हालांकि प्रशासनिक कार्रवाई के बाद भी थिएटर अपनी पुरानी गरिमा वापस नहीं पा सका। अश्लीलता में कुछ कमी जरूर आई, लेकिन नाटक पूरी तरह समाप्त हो गए। अब अधिकांश थिएटर केवल रिकॉर्डेड गानों पर आधारित डांस कार्यक्रमों तक सीमित हो गए हैं। कलाकारों की अभिनय कला, संवाद और सामाजिक संदेश गायब हो चुके हैं। दर्शकों को अब वह पारिवारिक और सांस्कृतिक वातावरण नहीं मिलता, जो कभी इस मेले की पहचान हुआ करता था।
कला और संस्कृति से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि प्रशासन और समाज दोनों मिलकर प्रयास करें तो थिएटर की पुरानी पहचान को फिर से जीवित किया जा सकता है। मलमास मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक विरासत भी है। ऐसे में यहां लोकनाट्य, भिखारी ठाकुर शैली के नाटक, भोजपुरी-मगही सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और सामाजिक संदेश देने वाले कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
स्थानीय कलाकारों को मंच देकर उनकी प्रतिभा को निखारा जा सकता है। विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर नाट्य प्रतियोगिताएं आयोजित कर नई पीढ़ी को थिएटर से जोड़ा जा सकता है। यदि सरकार और प्रशासन सांस्कृतिक समितियों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण कार्यक्रम आयोजित कराएं तो मेले की खोई हुई गरिमा फिर लौट सकती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि मनोरंजन और अश्लीलता के बीच अंतर समझा जाए। मनोरंजन समाज को स्वस्थ दिशा देने वाला होना चाहिए, न कि सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाने वाला। राजगीर जैसे धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल पर आयोजित मेले में प्रस्तुत होने वाले कार्यक्रमों का स्तर भी उसी अनुरूप होना चाहिए।
2026 में 17 मई से 15 जून तक एक बार फिर राजगीर में मलमास मेले का आयोजन होने जा रहा है। ऐसे में लोगों की निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस बार अश्लीलता पर पूरी तरह रोक लगा पाएगा? क्या थिएटर अपनी पुरानी सांस्कृतिक पहचान वापस हासिल कर सकेगा? क्या आने वाली पीढ़ी फिर से सामाजिक और पारिवारिक नाटकों का आनंद ले पाएगी?
यह केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की भी जिम्मेदारी है। जब तक दर्शक स्तरहीन कार्यक्रमों को स्वीकार करते रहेंगे, तब तक बदलाव संभव नहीं होगा। लोगों को भी अच्छे और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देना होगा।
राजगीर का मलमास मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है। इसकी गरिमा और पवित्रता बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। यदि समय रहते प्रयास नहीं किए गए तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि कभी राजगीर के थिएटर समाज को दिशा देने वाले मंच हुआ करते थे।
आज जरूरत है उस पुरानी सांस्कृतिक चेतना को फिर से जगाने की, जहां थिएटर मनोरंजन के साथ-साथ समाज का दर्पण भी हुआ करता था। तभी मलमास मेले की वास्तविक पहचान और उसकी सांस्कृतिक गरिमा सुरक्षित रह पाएगी।

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