आलेख: डॉ. श्याम नंदन प्रसाद , Ph. D. ( PLANT ECOLOGY )
पर्यावरणविद् , पटना , बिहार , इंडिया 6201190712
नवीनतम जानकारी ( जनरल नेचर ) के अनुसार विश्व में पेड़ों की संख्या 3.04 ट्रिलियन यानी 30. 4 लाख करोड़ है । यह अनुमान उपगृह चित्रों और जमीनी सर्वेक्षण के संयोजन के आधार पर की गई है । वैश्विक स्तर पर प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या 422 आंकी गई है । यदि हम अपने देश भारत की बात करें , तब यहां 35 – 36 अरब ( 358 करोड़ ) पेड़ हैं और ग्लोबल रैंकिंग में भारत 17 वें स्थान पर है , किंतु यहां प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या मात्र 28 है । यह अनुपात बेहद कम और चिंताजनक है , जबकि अमरीका में 699 और कनाडा में 10,163 ( सर्वाधिक ) प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या है । हर साल 15. 3 बिलियन ( 1,503 करोड़ ) पेड़ काटे जा रहे हैं । यही नहीं , केवल 5 बिलियन नए पेड़ ही उग पाते हैं । यह आंकड़ा चौंकाने वाला है और आज वैश्विक स्तर पर मौजूद पर्यावरण संकट की दौर में काफी चिंताजनक है । प्राप्त डाटा के अनुसार प्रति व्यक्ति लगभग 2 पेड़ कम हो रहें हैं । आधुनिकरण और शहरीकरण के नाम पर पेड़ों और वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण अब पृथ्वी पर पेड़ों की संख्या घटकर 46 प्रतिशत ही रह गई है , जो हमें खतरे का संकेत देती है । भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या 28 का होना एक गंभीर चिंता का विषय है ।
किसी भी देश में प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या उसके भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करती है , यह बात ठीक है , परंतु मेरा मानना है कि हम आधुनिकरण और शहरीकरण की माया मोह के जाल में फसकर पेड़ों और वनों की जो कटाई कर रहे हैं , उससे उत्पन्न जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव भी कम जिम्मेवार नहीं है । हम भूल चुके हैं कि हमारे जीने का आधार पेड़ पौधे ही हैं । क्या पेड़ पौधों के बिना हम जीने की कल्पना भी कर सकते हैं ? बिलकुल नहीं । हमारे जीने का आधार पेड़ वायु को स्वच्छ रखते हैं , पानी को छानते हैं और कटाव एवं बाढ़ से सुरक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । बात यहीं तक सीमित नहीं रह जाती है , बल्कि हमारे पेड़ गर्म होती जलवायु को रोकने के लिए कार्बन स्टोर करने का अति महत्वपूर्ण कार्य करते हैं । अगर हम अपने प्राचीन शास्त्रों की गहराइयों में झांक कर देखें , तब हमें ज्ञात होगा कि हम पर्यावरण के प्रति कितने संवेदनशील और जागरूक थे । हम विकास के पक्षधर हैं , किंतु पर्यावरण और प्रकृति से छेड़ छाड़ की कीमत पर कदापि नहीं । अगर पेड़ों की कटाई अपरिहार्य है , तब वैसी स्थिति में पर्यावरण मानकों का सख्ती से पालना किए जाने की नितांत आवश्यकता है । यहां महान इकोलॉजिस्ट दिवंगत डॉ. माधव डी गाडगिल के विचारों का उल्लेख अति आवश्यक हो जाता है । उनका स्पष्ट मानना था कि लोगों में यह भ्रम है कि पर्यावरण संरक्षण और विकास एक साथ नहीं हो सकते हैं । वर्तमान परिस्थिति में डॉ. माधव डी गाडगिल साहब के विचारों को अपनाने की जरूरत है । आज वैश्विक स्तर पर मौजूद पर्यावरण संकट की जो दंश मानव झेल रहा है , उस पर गहन चिंतन करने की घोर आवश्यकता है ।

एक पर्यावरणविद् होने के नाते मैं जब अपनी पूरी टीम के साथ विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करता हूं , तब मैने पाया है कि अभी भी आम लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरण का आभाव है । इसके लिए युद्ध स्तर पर आम लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरण पैदा करना होगा और पेड़ काटे जाने पर उत्पन्न प्रतिकूल स्थितियों के बारे में जानकारी देनी होगी । भारत में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में तीव्र गति से प्रयास किए जा रहे हैं , किंतु मेरा मानना है कि केवल सरकारी स्तर पर किए जा रहे प्रयासों से सफलता नहीं मिलेगी । आम लोगों की सकारात्मक भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी , तभी भारत में प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या में वृद्धि होगी और पर्यावरण संकट से मुक्ति मिल पाएगी । ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीन हाउस इफेक्ट को न्यून करने का हर संभव प्रयास करना होगा । नदियों की पवित्रता को पुनः वापस लाना होगा । जैव विविधता को कायम रखने के लिए जी तोड़ प्रयास करने होंगे । जैव विविधता में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले पुराने वृक्षों को संरक्षित कर उन्हें विरासत वृक्ष घोषित करना होगा । बिहार में 32 पुराने वृक्षों को विरासत वृक्ष घोषित किया गया है , यह स्वागत योग्य कदम है । पूरे देश में जैव विविधता को कायम रखने वाले पुराने वृक्षों को विरासत वृक्ष घोषित कर उन्हें संरक्षित किए जाने का अब समय आ गया है ।
हम जानते हैं कि पारिस्थितिकी तंत्र में प्रत्येक जीव की मौजूदगी आवश्यक है , ताकि फूड चेन और फूड वेब कायम रह सकें। यदि कोई जीव मानव जनित गतिविधियों से विलुप्त हो जाता है , तब इसका सीधा असर पर्यावरण संतुलन पर पड़ता है । गिद्ध का लगभग विलुप्त होना इसका ताज़ा उदाहरण है । पटना और अन्य शहरों में मानव जीवन के वरदान गौरैया की संख्या में लगातार कमी और विलुप्ति की ओर अग्रसर दूसरा उदाहरण है । पवित्र गंगा नदी में डॉल्फिन की संख्या में निरंतर कमी को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं । शहरों में प्रदूषण के कारण शायद ही वायु गुणवत्ता सूचकांग सामान्य रहता है । इसके लिए कौन जिम्मेवार है ? निश्चित रूप से मानव गतिविधियों के कारण ही ऐसी विषम परिस्थिति उत्पन्न हो गई है । हमें हर हाल में भारत को स्वच्छ , सुंदर , हरा भरा और सभी प्रकार के प्रदूषणों से मुक्त करना होगा , तभी हम पर्यावरण संकट से निजात पा सकते हैं और युद्ध स्तर पर वृक्षारोपण कर प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या में वृद्धि कर सकते हैं । वनीकरण ( Afforestation ) से हम आज वैश्विक स्तर पर मौजूद जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न कुप्रभावों से निपट सकते हैं । यहां उल्लेखनीय है कि केवल पेड़ लगाकर उसे भाग्य भरोसे छोड़ देने से हम कदापि सफल नहीं हो सकते हैं । वृक्षारोपण के बाद उस पेड़ की तब तक एक परिवार की तरह समुचित देखभाल करनी होगी , जब तक वह पेड़ बड़ा होकर पर्यावरण संरक्षण में अपनी सकारात्मक भूमिका अदा करने के लायक नहीं हो जाए ।
सौजन्य : गूगल से प्राप्त आंकड़ा के आधार पर आलेख । मैं गूगल से प्राप्त आंकड़ा और उसके फेयर यूज के लिए गूगल और संबंधित महानुभावों के प्रति आभार प्रकट करता हूं ।
पुनः मैं अपने सहयोगी डॉ. नंदीपति तिवारी , समन्वयक , जंतु शास्त्र विभाग , नालंदा खुला विश्वविद्यालय , नालंदा के प्रति भी आभार प्रकट किए बिना नहीं रह सकता हूं , जिन्होंने इस आलेख को जन जागरण और राष्ट्र हित में लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया और मेरे मनोबल को बढ़ाया ।






