संजय कुमार
बिहारशरीफ (अपना नालंदा)। फरक्का (गंगा) जल संधि को बिहार के हितों के प्रतिकूल बताते हुए जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने इसके नवीनीकरण का विरोध किया है। बिहार के जल-अधिकार और राज्यवासियों के हितों को लेकर शुक्रवार को जिला मुख्यालय में जदयू की ओर से प्रेसवार्ता आयोजित की गई। इस दौरान पार्टी नेताओं ने फरक्का जल संधि के कथित प्रभाव, बिहार में बाढ़ और सूखे की स्थिति तथा राज्य की जल आवश्यकताओं को लेकर विस्तार से अपनी बात रखी।
प्रेसवार्ता में जदयू नेताओं ने कहा कि पार्टी का स्पष्ट मत है कि वर्ष 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई फरक्का जल संधि का बिहार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। पार्टी की ओर से इसी विषय पर लोगों को जागरूक करने के लिए ‘फरक्का जल संधि पर नीतीश संवाद’ कार्यक्रम चलाया जा रहा है। जदयू नेताओं का कहना है कि यह अभियान किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि बिहार के जल-अधिकार और आम लोगों के हित से जुड़ा जनसरोकार का विषय है।
गंगा किनारे बसे 12 जिलों में चल रहा संवाद
जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा एवं प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा के नेतृत्व में चल रहे इस अभियान के तहत गंगा किनारे बसे बिहार के 12 जिलों में लोगों के बीच संवाद किया जा रहा है। इनमें बक्सर, भोजपुर, सारण, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, लखीसराय, मुंगेर, खगड़िया, भागलपुर और कटिहार शामिल हैं।
पार्टी नेताओं के अनुसार इन जिलों का चयन इसलिए किया गया है, क्योंकि गंगा और फरक्का से जुड़े जल प्रवाह के प्रभाव का इन क्षेत्रों पर विशेष असर पड़ता है। अभियान की शुरुआत 5 सितंबर को बक्सर से की गई है, जबकि इसका समापन कटिहार में किया जाएगा। बिहार में गंगा बक्सर के रास्ते प्रवेश करती है और कटिहार के रास्ते राज्य से बाहर निकलती है। इसी क्रम को ध्यान में रखते हुए अभियान को गंगा के प्रवाह क्षेत्र के साथ जोड़ा गया है।

शुष्क मौसम में पानी के बंटवारे को लेकर सवाल
प्रेसवार्ता में जदयू नेताओं ने फरक्का जल संधि के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि शुष्क मौसम यानी जनवरी से 31 मई के बीच गंगा के प्रवाह में काफी कमी आ जाती है। पार्टी का दावा है कि बक्सर के पास गंगा का प्रवाह करीब 400 क्यूमेक तक रह जाने की स्थिति में भी फरक्का से बांग्लादेश के लिए निर्धारित मात्रा में पानी उपलब्ध कराने का दबाव रहता है।
जदयू नेताओं ने कहा कि इसका सीधा असर बिहार के जल प्रबंधन पर पड़ता है। पार्टी का आरोप है कि जब नदी में पानी की उपलब्धता कम होती है, उस समय बिहार के किसानों की सिंचाई, पेयजल, उद्योगों की आवश्यकताओं और आम लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए जल प्रबंधन किया जाना चाहिए।
पार्टी नेताओं ने सवाल उठाया कि यदि राज्य में ही पानी की उपलब्धता कम हो और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत पानी की आपूर्ति करनी पड़े तो इसका सबसे अधिक असर बिहार के लोगों पर पड़ता है।
बाढ़ और सूखे की दोहरी समस्या का जिक्र
जदयू नेताओं ने फरक्का बराज और जल संधि को बिहार की बाढ़ और सूखे की समस्या से भी जोड़ते हुए अपनी चिंता जाहिर की। पार्टी का कहना है कि फरक्का बराज के कारण गंगा में भारी मात्रा में गाद जमा होने से नदी का तल ऊंचा हुआ है, जिसके कारण उत्तर बिहार के कई क्षेत्रों में बाढ़ की समस्या गंभीर होती जा रही है।
वहीं दूसरी ओर शुष्क मौसम में पानी की उपलब्धता कम होने के कारण दक्षिण और मध्य बिहार के कई हिस्सों में सिंचाई एवं पेयजल की समस्या उत्पन्न होने का दावा किया गया। जदयू नेताओं ने कहा कि बिहार एक तरफ हर साल बाढ़ की त्रासदी झेलता है, जबकि दूसरी ओर गर्मी और शुष्क मौसम में कई क्षेत्रों में पानी की कमी का सामना करता है।
पार्टी ने इसे जल प्रबंधन की गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि बिहार की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार को इस विषय पर पुनर्विचार करना चाहिए।

2050 तक की जरूरतों को ध्यान में रखने की मांग
प्रेसवार्ता में जदयू नेताओं ने बताया कि पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने हाल में संसद के मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था। उनका कहना है कि फरक्का जल संधि का नवीनीकरण नहीं होना चाहिए और यदि भविष्य में कोई समझौता होता है तो उसमें बिहार की दीर्घकालिक जल आवश्यकताओं को शामिल किया जाना चाहिए।
जदयू ने बिहार की वर्ष 2050 तक की जल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किसी भी भविष्य के समझौते या जल बंटवारे की व्यवस्था तैयार करने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि बिहार के किसानों, आम लोगों, उद्योगों और आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों को नजरअंदाज करके कोई भी जल नीति तैयार नहीं की जानी चाहिए।
‘बिहार की आवाज केंद्र तक पहुंचाना उद्देश्य’
प्रेसवार्ता में नेताओं ने कहा कि ‘फरक्का जल संधि पर नीतीश संवाद’ के माध्यम से पार्टी आम लोगों को यह बताना चाहती है कि अंतरराष्ट्रीय जल समझौते का बिहार के जल संसाधनों पर क्या प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि बिहार की अर्थव्यवस्था, कृषि, रोजगार और जनजीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण जीवनरेखा है।
नेताओं के अनुसार बिहार के किसानों की सिंचाई, लोगों के पेयजल, उद्योगों की जरूरत और लाखों लोगों की आजीविका सीधे जल उपलब्धता से जुड़ी है। ऐसे में बिहार के हिस्से के पानी और राज्य की भविष्य की जल आवश्यकताओं पर गंभीरता से विचार किया जाना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि जदयू इस अभियान के जरिए बिहार की आवाज को केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाना चाहती है, ताकि गंगा और फरक्का से जुड़े मुद्दे व्यापक राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनें और जल संधि की समीक्षा पर गंभीर चर्चा हो।
मुद्दे को राजनीतिक नहीं, जनसरोकार बता रही जदयू
जदयू नेताओं ने कहा कि फरक्का जल संधि का मुद्दा केवल किसी एक राजनीतिक दल का विषय नहीं है। यह बिहार के किसानों, मजदूरों, उद्योगों, शहरों और गांवों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। पार्टी का दावा है कि अभियान को आम लोगों का व्यापक समर्थन मिल रहा है।
पार्टी नेताओं ने कहा कि बिहार के जल संसाधनों और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए राज्य के हितों की मजबूती से पैरवी की जानी चाहिए। उनका कहना था कि बिहार के हक की बात उठाना किसी के विरोध का विषय नहीं, बल्कि राज्य के लोगों के अधिकारों और हितों की रक्षा का प्रयास है।
प्रेसवार्ता में नेताओं ने दोहराया कि फरक्का जल संधि के नवीनीकरण से पहले बिहार के हितों, जल उपलब्धता, बाढ़-सूखा प्रबंधन और भविष्य की आवश्यकताओं का व्यापक आकलन किया जाना चाहिए। जदयू ने कहा कि बिहार के जल-अधिकार को लेकर उसका अभियान आगे भी जारी रहेगा।







