संजय कुमार
पटना(अपना नालंदा)। बिहार की कृषि विरासत और पारंपरिक स्वाद का प्रतीक माना जाने वाला दीघा का प्रसिद्ध “दूधिया मालदह” आम अब अंतरराष्ट्रीय पहचान की ओर तेजी से बढ़ रहा है। अपनी अनोखी मिठास, खास सुगंध और दूधिया चमक के कारण पहचान रखने वाला यह आम जल्द ही भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग प्राप्त कर सकता है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय और कृषि अनुसंधान संस्थान इस दिशा में लगातार प्रयास कर रहे हैं।
पटना के दीघा क्षेत्र में कभी विशाल आम के बागान हुआ करते थे। गर्मियों में पूरा इलाका आम की खुशबू से महक उठता था। आज शहरीकरण और बहुमंजिला इमारतों के विस्तार के कारण ये बागान लगभग समाप्त हो चुके हैं। फिर भी बिहार विद्यापीठ, संत जेवियर्स कॉलेज और कुर्जी फैमिली हॉस्पिटल परिसर में इस दुर्लभ प्रजाति के कुछ पुराने वृक्ष अब भी सुरक्षित हैं। इन्हीं पेड़ों को आधार बनाकर इस विरासत को बचाने की कोशिश की जा रही है।
पटना के मीठापुर स्थित कृषि अनुसंधान संस्थान में दूधिया मालदह आम के प्रमाणित कलमी पौधे तैयार किए जा रहे हैं। संस्थान के निदेशक डॉ. शिवनाथ दास ने बताया कि पिछले दो वर्षों से इस आम के संरक्षण और प्रचार-प्रसार पर विशेष कार्य हो रहा है। उन्होंने कहा कि गंगा, सोन, गंडक और पुनपुन नदियों के जल से मिलने वाले खनिज तत्व इस आम को विशेष स्वाद और दूधिया चमक प्रदान करते हैं। यही कारण है कि इसका स्वाद अन्य क्षेत्रों में तैयार होने वाले आमों से अलग माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, दूधिया मालदह आम में गूदा अधिक और गुठली बेहद पतली होती है। इसका स्वाद इतना खास होता है कि इसे “मालदह का राजा” भी कहा जाता है। वैज्ञानिक जांच में इसका टीएसएस संतुलित पाया गया है, जिसके कारण चिकित्सकीय सलाह के अनुसार मधुमेह रोगी भी सीमित मात्रा में इसका सेवन कर सकते हैं।

जीआई टैग के लिए बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने ऐतिहासिक और वैज्ञानिक प्रमाण जुटाए हैं। बिहार अभिलेखागार, खुदाबख्श लाइब्रेरी तथा बिहार विधानसभा पुस्तकालय से वर्ष 1905 और 1907 के दस्तावेज एकत्र किए गए हैं, जिनमें इस आम का उल्लेख मिलता है। विश्वविद्यालय द्वारा भारत सरकार को आवेदन भेजा जा चुका है और प्रक्रिया लगभग पूरी मानी जा रही है। अगले एक-दो महीनों में स्वीकृति मिलने की संभावना जताई जा रही है।
मुख्य वैज्ञानिक डॉ. संगीता कुमारी ने बताया कि संस्थान में करीब 50 हजार कलमी पौधे तैयार किए जा रहे हैं। सभी पौधे ‘साटा बांध’ तकनीक से विकसित किए जाते हैं, जिससे मातृ वृक्ष के सभी गुण नए पौधों में सुरक्षित रहते हैं। किसानों के बीच भी इस आम की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, दूधिया मालदह केवल एक फल नहीं बल्कि दीघा की सांस्कृतिक पहचान है। कभी गंगा नदी के रास्ते नावों से इसकी सप्लाई दूर-दूर तक होती थी। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन भी इसके स्वाद के प्रशंसक थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने से इस आम की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी, किसानों को बेहतर बाजार मिलेगा और दीघा की खोती हुई पहचान फिर से जीवित हो सकेगी।







