बिहार की राजनीति में मौजूदा समय एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी, जिसने दशकों तक गठबंधन की राजनीति में “जूनियर पार्टनर” की भूमिका निभाई, आज उस मुकाम पर पहुंच चुकी है जहां वह अपने दम पर मुख्यमंत्री देने की स्थिति में दिखाई दे रही है। सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री के रूप में उभरना केवल किसी एक नेता की राजनीतिक सफलता नहीं है, बल्कि यह उस लंबे संघर्ष, संगठनात्मक मेहनत और रणनीतिक राजनीति का परिणाम है, जिसे वर्षों तक कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मिलकर तैयार किया। वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया के अनुसार यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बिहार में भाजपा के संगठनात्मक और वैचारिक विस्तार की एक बड़ी उपलब्धि है।
जनसंघ से भाजपा तक: संघर्ष की शुरुआत

बिहार में भाजपा की राजनीतिक जड़ें भारतीय जनसंघ के दौर से जुड़ी रही हैं। हालांकि 1980 में भाजपा के गठन के बाद ही पार्टी ने अपने राजनीतिक विस्तार की नई शुरुआत की। उस समय बिहार की राजनीति में कांग्रेस का वर्चस्व था और भाजपा का संगठन बेहद कमजोर माना जाता था।
इसी कठिन दौर में कैलाशपति मिश्र का नाम प्रमुखता से सामने आता है। उन्हें बिहार भाजपा का “भीष्म पितामह” कहा जाता है। इसकी वजह यह है कि उन्होंने उस दौर में पार्टी का संगठन खड़ा किया, जब भाजपा का नाम लेना भी राजनीतिक रूप से आसान नहीं था। 1980 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 246 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन मात्र 21 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी। 1985 के चुनाव में यह संख्या घटकर 16 रह गई। कई उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो जाती थी। यह भाजपा के लिए अस्तित्व की लड़ाई का समय था।
लेकिन कैलाशपति मिश्र ने हार नहीं मानी। उन्होंने संगठन को गांव-गांव तक फैलाने की कोशिश की, कार्यकर्ताओं को जोड़ा और पार्टी के लिए वैचारिक आधार तैयार किया। यही आधार आगे चलकर भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बना।
1990 का दशक: राजनीतिक बदलाव की शुरुआत
1990 का दशक बिहार की राजनीति के लिए निर्णायक साबित हुआ। इसी दौर में लालू प्रसाद यादव का उदय हुआ और सामाजिक न्याय की राजनीति ने पूरे राज्य की दिशा बदल दी। इसी समय भाजपा ने भी अपनी रणनीति को बदला और नए सामाजिक समीकरणों को समझने का प्रयास किया।
1990 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 39 सीटें जीतीं और 1995 में यह संख्या बढ़कर 41 हो गई। यह संकेत था कि भाजपा अब हाशिए की पार्टी नहीं रही, बल्कि राज्य की राजनीति में एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर रही है। पार्टी का संगठन लगातार मजबूत हो रहा था और कार्यकर्ताओं का आधार भी बढ़ रहा था।
सुशील मोदी का दौर: रणनीति और विश्वसनीयता
अगर बिहार में भाजपा को मजबूत राजनीतिक पहचान देने का श्रेय किसी नेता को दिया जाता है, तो वह सुशील कुमार मोदी हैं। उन्हें अक्सर संगठन और रणनीति का कुशल संयोजक माना जाता है। 2000 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 67 सीटें जीतकर अपनी ताकत का एहसास कराया।
सुशील मोदी ने विपक्ष में रहते हुए भी सरकार की नीतियों पर लगातार सवाल उठाए और भाजपा को एक मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित किया। उन्होंने संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ पार्टी को विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प के रूप में भी प्रस्तुत किया। वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया के अनुसार सुशील मोदी ने भाजपा को सिर्फ राजनीतिक ताकत नहीं दी, बल्कि उसे विश्वसनीयता भी दिलाई।
नीतीश-भाजपा गठबंधन: सत्ता की राह
बिहार में भाजपा के राजनीतिक विस्तार में नीतीश कुमार के साथ गठबंधन एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। 2005 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-जदयू गठबंधन ने सत्ता हासिल की और राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव आया।
फरवरी 2005 में भाजपा को 37 सीटें मिलीं, जबकि अक्टूबर 2005 के चुनाव में यह संख्या बढ़कर 55 हो गई। 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 91 सीटें जीतकर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। हालांकि मुख्यमंत्री जदयू के नीतीश कुमार थे, लेकिन भाजपा ने सरकार में अहम भूमिका निभाई।
इस दौर में सुशील मोदी उपमुख्यमंत्री के रूप में प्रशासनिक अनुभव हासिल कर रहे थे और भाजपा को सत्ता संचालन की समझ भी मिल रही थी। यह भाजपा के लिए राजनीतिक परिपक्वता का दौर था।
2013 से 2015: संकट और आत्ममंथन
2013 में भाजपा और जदयू का गठबंधन टूट गया, जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया। इसके बाद 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ा और 53 सीटों पर सिमट गई। यह पार्टी के लिए बड़ा झटका था, लेकिन इसी झटके ने भाजपा को आत्ममंथन का मौका भी दिया।

पार्टी ने संगठन को मजबूत करने और नई रणनीति तैयार करने पर ध्यान दिया। इसी रणनीति का परिणाम आने वाले वर्षों में देखने को मिला।
वापसी और विस्तार
2017 में नीतीश कुमार फिर से एनडीए में लौट आए। इसके बाद 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 74 सीटें जीतकर अपनी ताकत का मजबूत संकेत दिया। यह स्पष्ट हो गया कि अब भाजपा बिहार की राजनीति में केवल सहयोगी दल नहीं रही, बल्कि नेतृत्व की भूमिका निभाने की ओर बढ़ रही है।
सम्राट चौधरी का उदय: नई पीढ़ी का नेतृत्व
सम्राट चौधरी का राजनीतिक उदय भाजपा की नई रणनीति का प्रतीक माना जा रहा है। 2018 में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने कम समय में अपनी अलग पहचान बना ली। संगठन में उनकी सक्रियता और राजनीतिक आक्रामकता ने उन्हें तेजी से आगे बढ़ाया।
2024 में वे उपमुख्यमंत्री बने और 2025 के चुनाव में भाजपा को 89 सीटों की बड़ी सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चंदन चौरसिया के अनुसार सम्राट चौधरी भाजपा की उस नई राजनीति का चेहरा हैं, जिसमें संगठन, सामाजिक समीकरण और आक्रामक राजनीतिक रणनीति का संतुलन दिखाई देता है।
किसकी सींची फसल काट रहे हैं सम्राट?
अगर भाजपा की इस सफलता को व्यापक नजरिए से देखा जाए, तो यह कई नेताओं और कार्यकर्ताओं की दशकों की मेहनत का परिणाम है।
कैलाशपति मिश्र ने संगठन की नींव रखी।
सुशील कुमार मोदी ने पार्टी को राजनीतिक पहचान और रणनीति दी।
नीतीश कुमार के साथ गठबंधन ने भाजपा को सत्ता का अनुभव दिलाया।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को वैचारिक ऊर्जा दी।
इन सभी प्रयासों का परिणाम आज भाजपा की मजबूत स्थिति के रूप में दिखाई दे रहा है, जिसका नेतृत्व सम्राट चौधरी कर रहे हैं।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि सत्ता तक पहुंचना जितना कठिन होता है, उसे संभालना उससे कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है। सम्राट चौधरी के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। उन्हें संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाए रखना होगा, जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधना होगा और विपक्ष के राजनीतिक हमलों का प्रभावी जवाब देना होगा।
निष्कर्ष: नए दौर की शुरुआत
बिहार की राजनीति में भाजपा का यह उभार केवल चुनावी सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह दशकों के संघर्ष, संगठनात्मक धैर्य और रणनीतिक राजनीति की परिणति है। सम्राट चौधरी का उदय इस लंबी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया के शब्दों में, “यह अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। भाजपा को अब यह साबित करना होगा कि वह केवल चुनाव जीतने में ही नहीं, बल्कि प्रभावी शासन देने में भी सक्षम है।”
वास्तव में यह कहा जा सकता है कि बीज किसी और ने बोया था, उसे सींचा भी कई हाथों ने, लेकिन अब उस फसल को संभालने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सम्राट चौधरी के कंधों पर है।







