राजगीर मलमास मेले में मांस-मछली बिक्री पर बवाल, संतों ने उठाई प्रतिबंध की मांग

Written by Sanjay Kumar

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राजगीर (अपना नालंदा)। विश्व प्रसिद्ध राजकीय मलमास मेला में मांस, मछली और अंडे की बिक्री को लेकर विवाद गहराने लगा है। देश के विभिन्न हिस्सों से राजगीर पहुंचे संत-महात्माओं और धार्मिक संगठनों ने प्रशासन से मेला क्षेत्र को पूर्ण रूप से निरामिष क्षेत्र घोषित करने की मांग की है। संत समाज का कहना है कि पुरुषोत्तम मास पूरी तरह आध्यात्मिक साधना, तपस्या और सात्विक जीवन का पर्व है, ऐसे में मेला क्षेत्र में मांसाहार की बिक्री धार्मिक भावनाओं को आहत कर रही है।
संतों का तर्क है कि प्रयागराज के कुंभ और माघ मेले तथा देवघर के श्रावणी मेले जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों में मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री पर प्रतिबंध रहता है। उसी तर्ज पर राजगीर के मलमास मेले में भी मांस, मछली और अंडे की बिक्री पर रोक लगाई जानी चाहिए। उनका कहना है कि धार्मिक आस्था और परंपराओं के सम्मान के लिए यह आवश्यक कदम है।
संत समाज के प्रतिनिधियों ने बताया कि मेला शुरू होने से करीब तीन माह पूर्व ही जिला प्रशासन, अनुमंडल प्रशासन और नगर परिषद को ज्ञापन देकर इस संबंध में मांग की गई थी। इसके बावजूद मेला क्षेत्र में कई स्थानों पर मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री जारी है। इससे साधु-संतों के साथ-साथ बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं में भी असंतोष देखा जा रहा है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुरुषोत्तम मास के दौरान तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का राजगीर में निवास माना जाता है। इस अवधि में लाखों श्रद्धालु कल्पवास, पूजा-अर्चना, दान-पुण्य और आध्यात्मिक साधना के लिए यहां पहुंचते हैं। संतों का कहना है कि ऐसे पवित्र अवसर पर सात्विक वातावरण बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। उनका मानना है कि जीव हिंसा और मांसाहार जैसी गतिविधियां धार्मिक वातावरण के अनुरूप नहीं हैं।
संतों ने यह भी याद दिलाया कि पिछले मलमास मेले के दौरान प्रशासन ने उनकी मांग पर जीव हिंसा पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाए थे। इसलिए इस बार भी प्रशासन से उसी प्रकार की सख्त कार्रवाई की अपेक्षा की जा रही है। उन्होंने मांग की कि पूरे मेला क्षेत्र को औपचारिक रूप से निरामिष घोषित कर मांस, मछली और अंडे की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जाए।
इधर प्रशासन द्वारा श्रद्धालुओं को सस्ती और शुद्ध शाकाहारी भोजन व्यवस्था उपलब्ध कराने के लिए “जीविका दीदी की रसोई” संचालित की जा रही है, जिसे श्रद्धालुओं का अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। हालांकि संत समाज का कहना है कि केवल शाकाहारी भोजन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मेला क्षेत्र में मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री पर भी स्पष्ट प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। अब सभी की निगाहें प्रशासन के अगले निर्णय पर टिकी हुई हैं।

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