विकास से भटकी राजनीति: ‘ब्राह्मणवाद’ विवाद के जरिए भ्रम फैलाने का विपक्षी एजेंडा बेनकाब
बिहार की सियासत में फिर शब्दों की चिंगारी भड़की है, एक बयान ने पूरे राजनीतिक गलियारे को गरमा दिया है। बिहार विधानसभा के हालिया सत्र में जब विधायक संदीप सौरभ ने अपने भाषण के दौरान “ब्राह्मणवाद” शब्द का प्रयोग किया, तो सदन में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। नेता प्रतिपक्ष विजय सिन्हा ने इसे न केवल आपत्तिजनक बल्कि सामाजिक रूप से विभाजनकारी बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया। उनका स्पष्ट कहना था कि किसी भी जाति या समुदाय को वैचारिक बहस के नाम पर कटघरे में खड़ा करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। सदन में हंगामे के बाद इस शब्द को कार्यवाही से हटाने का निर्णय लिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या विपक्ष मुद्दों की कमी के कारण सामाजिक विभाजन की राजनीति का सहारा ले रहा है? वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया के विश्लेषण के अनुसार, यह विवाद केवल एक शब्द का नहीं बल्कि राजनीतिक सोच का आईना है—जहाँ विकास, रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए प्रतीकात्मक टकराव को हवा दी जाती है।

इस पूरे प्रकरण को व्यापक राजनीतिक संदर्भ में समझना जरूरी है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय जनता पार्टी ने बिहार सहित देशभर में विकास, बुनियादी ढांचे, सामाजिक कल्याण और पारदर्शिता को केंद्र में रखकर राजनीति की है। ऐसे में विपक्ष द्वारा “ब्राह्मणवाद” जैसे शब्द का प्रयोग केवल वैचारिक आलोचना नहीं बल्कि एक विशेष समुदाय को निशाने पर लेने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। चंदन चौरसिया का मानना है कि यदि किसी भी विचारधारा की आलोचना करनी हो तो वह तथ्यों और नीतियों के आधार पर होनी चाहिए, न कि ऐसे शब्दों के माध्यम से जो सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करें। भाजपा की ओर से यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन समाज को जातीय खांचों में बांटने का अधिकार किसी को नहीं। विजय सिन्हा का आक्रोश इसी व्यापक भावना का प्रतिनिधित्व करता है—जहाँ वे सदन की गरिमा और सामाजिक समरसता दोनों की रक्षा की बात करते नजर आए। सवाल यह भी है कि क्या विपक्ष जानबूझकर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर राजनीतिक ध्रुवीकरण चाहता है? यदि ऐसा है तो यह रणनीति अल्पकालिक राजनीतिक लाभ तो दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
चौरसिया ने कहा बिहार की जनता अब परिपक्व हो चुकी है और वह शब्दों के जाल में फंसने वाली नहीं। राज्य की जनता स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण, सड़क और पुल निर्माण, निवेश, युवाओं के रोजगार और कानून-व्यवस्था जैसे ठोस मुद्दों पर जवाब चाहती है। भाजपा का रुख स्पष्ट है—राजनीति का केंद्र विकास होना चाहिए, न कि वैचारिक लेबलिंग। यदि “ब्राह्मणवाद” जैसे शब्दों के माध्यम से किसी समुदाय विशेष को अप्रत्यक्ष रूप से कटघरे में खड़ा किया जाता है, तो यह सामाजिक सौहार्द को आहत करता है। लोकतंत्र में बहस होनी चाहिए, लेकिन वह समावेशी और सकारात्मक होनी चाहिए। भाजपा ने सदन में जिस प्रकार विरोध दर्ज कराया, वह केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक संतुलन की रक्षा का प्रयास था। अंततः यह विवाद विपक्ष के लिए आत्ममंथन का अवसर है—क्या वे वैकल्पिक नीतिगत दृष्टि प्रस्तुत करेंगे या फिर शब्दों की आग में राजनीतिक रोटियां सेंकते रहेंगे? बिहार की राजनीति को अब टकराव नहीं, समाधान चाहिए; विभाजन नहीं, विकास चाहिए। और यही संदेश इस पूरे प्रकरण से उभरकर सामने आता है—जनता विकास की राजनीति के साथ है, और जो भी शक्ति समाज को बांटने की कोशिश करेगी, उसे लोकतांत्रिक तरीके से जवाब मिलेगा।





