संजय कुमार
बिहारशरीफ (अपना नालंदा)।भारत की राष्ट्रपति, श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार को राजगीर परिसर में आयोजित नालन्दा विश्वविद्यालय के द्वितीय दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की और विद्यार्थियों को संबोधित किया। यह अवसर विश्वविद्यालय के पुनरुत्थान और वैश्विक जुड़ाव की निरंतर यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने इस दीक्षांत समारोह को एक शाश्वत सभ्यतागत संकल्प की पुनरावृत्ति बताया- कि ज्ञान का अंत नहीं होगा, संवाद बना रहेगा और शिक्षा मानवता की सेवा करती रहेगी। उन्होंने स्नातक होने वाले विद्यार्थियों को बधाई दी और इस बात की सराहना की कि इस बैच में 30 से अधिक देशों के छात्र शामिल हैं, जो इसके सशक्त अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को दर्शाता है।

राष्ट्रपति ने अपने भाषण में विशेष रूप से उल्लेख किया: “यह देखकर प्रसन्नता होती है कि आज का नालन्दा विश्वविद्यालय भी अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को आकर्षित कर रहा है। यह नालन्दा विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित ज्ञान एवं शिक्षा केंद्र के रूप में पुनः उभरने का शुभ संकेत है। मुझे विश्वास है कि नालन्दा विश्वविद्यालय एशिया और विश्व में एक अग्रणी शिक्षण संस्थान के रूप में उभरेगा। यह न केवल अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता बल्कि अपने मूल्यों के लिए भी विशिष्ट पहचान बनाएगा। मुझे यह देखकर प्रसन्नता होती है कि विश्वविद्यालय इंटरडिसिप्लिनरी लर्निंग (अन्तरविषयक शिक्षण), अंतरराष्ट्रीय सहयोग और स्थानीय समुदायों के साथ सहभागिता के माध्यम से इस दिशा में निरंतर अग्रसर है।”

विश्वविद्यालय की ‘सहभागिता’ पहल पर राष्ट्रपति ने आगे कहा: “किसी भी विश्वविद्यालय के लिए अपने स्थानीय परिवेश से जुड़े रहना भी आवश्यक होता है। उसकी प्रगति का लाभ उस स्थानीय समाज को भी मिलना चाहिए, जहाँ वह स्थापित है। मैं विश्वविद्यालय की ‘सहभागिता संवाद’ पहल की सराहना करती हूँ, जिसके माध्यम से स्थानीय समुदायों और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के साथ जुड़ने के सार्थक प्रयास किए जा रहे हैं।”

बिहार के राज्यपाल, सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त) ने नालन्दा विश्वविद्यालय को निरंतरता और नवीनीकरण का प्रतीक बताया, जो अतीत के ज्ञान को वर्तमान की आकांक्षाओं के साथ जोड़ता है। उन्होंने कहा कि यह विश्वविद्यालय उन स्थायी मूल्यों का प्रमाण है जो मानवता के भविष्य का मार्गदर्शन कर सकते हैं।
भारत के विदेश मंत्री, डॉ. सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने अपने संबोधन में विश्वविद्यालय के अद्वितीय अंतरराष्ट्रीय चरित्र पर जोर दिया। उन्होंने कहा: “यह विश्वविद्यालय अपने अंतरराष्ट्रीय स्वरूप में अद्वितीय है। वैश्वीकरण के इस युग में इसका महत्व और भी बढ़ गया है। जैसे-जैसे हम ‘विकसित भारत’ की ओर बढ़ रहे हैं, यह आवश्यक है कि भारत दुनिया के लिए तैयार हो और दुनिया भारत के लिए। इसके लिए आने वाली पीढ़ियों को वैश्विक घटनाक्रमों के प्रति अधिक संवेदनशील और जुड़ा हुआ होना होगा। मुझे विश्वास है कि यह स्नातक बैच इस दिशा में बदलाव लाएगा। विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय छात्र अपने देशों में वापस जाकर भारत के दूत बनेंगे।”
डॉ. जयशंकर ने आगे कहा कि नालन्दा की परंपरा वैश्विक व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण में एक शक्तिशाली प्रभाव डाल सकती है। उन्होंने याद दिलाया कि “विकास भी, विरासत भी”- यानी तकनीक और परंपरा को साथ-साथ चलना चाहिए।

बिहार सरकार के ग्रामीण विकास एवं परिवहन मंत्री, श्री श्रवण कुमार ने नालन्दा के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला और कहा कि यह विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने का संस्थान नहीं, बल्कि चरित्र और बुद्धि के समग्र विकास का प्रतीक है।
कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने गणमान्य अतिथियों का स्वागत किया और विश्वविद्यालय की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने LEAP (लर्न, अर्न और पायनियर) कार्यक्रम, ‘सहभागिता संवाद’ और स्थानीय एवं अंतरराष्ट्रीय समुदायों के साथ जुड़ाव जैसी प्रमुख शैक्षणिक और संस्थागत पहलों के बारे में जानकारी दी।
इस अवसर पर राष्ट्रपति ने नवनिर्मित 2000 सीटों वाले अत्याधुनिक सभागार, ‘विश्वामित्रालय’ का उद्घाटन किया। उन्होंने ‘सहभागिता प्रदर्शनी’ का अवलोकन किया और स्थानीय समुदाय के सदस्यों के साथ संवाद किया। साथ ही, उन्होंने मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान किए।
नालन्दा विश्वविद्यालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के प्रति आभार व्यक्त किया, जिनके सहयोग से बोधिसत्व अवलोकितेश्वर की एक प्रतिकृति तैयार कर राष्ट्रपति को स्मृति चिह्न के रूप में भेंट की गई।
यह द्वितीय दीक्षांत समारोह परंपरा और आधुनिकता, भारत और विश्व, तथा ज्ञान और मूल्यों के समन्वय के साथ भविष्य के जिम्मेदार वैश्विक नेतृत्व तैयार करने के नालन्दा के संकल्प का उत्सव है।







