अखिलेंद्र कुमार
बिहारशरीफ (अपना नालंदा)।इन दिनों नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही निजी विद्यालयों में नामांकन प्रक्रिया जोर पकड़ चुकी है। लेकिन विभिन्न प्रकार के शुल्क वसूले जाने के कारण अभिभावकों में असंतोष और आक्रोश भी देखने को मिल रहा है। कई निजी विद्यालयों में नामांकन शुल्क, विकास शुल्क, पुस्तक और अन्य मदों के नाम पर अभिभावकों से भारी रकम ली जा रही है। इससे अभिभावकों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। लोगों का कहना है कि कई निजी विद्यालय शिक्षा का केंद्र बनने के बजाय धीरे-धीरे धन उगाही का माध्यम बनते जा रहे हैं।
स्थिति यह है कि बेहतर शिक्षा की उम्मीद में अभिभावक मजबूर होकर अपने बच्चों का नामांकन इन विद्यालयों में करवा रहे हैं। लगातार बढ़ती फीस और अलग-अलग शुल्क के कारण निजी विद्यालयों की छवि भी आम लोगों के बीच धूमिल होती जा रही है। कई अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य बच्चों का भविष्य बनाना होना चाहिए, न कि अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ाना।

इसी बीच जिला मुख्यालय बिहारशरीफ में पिछले लगभग 46 वर्षों से संचालित एक विद्यालय आज भी कम शुल्क में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की परंपरा को कायम रखे हुए है। कागजी मोहल्ला (भैंसासुर मोड़ के उत्तर) स्थित जानकी शिशु महाविहार में शिशु वर्ग से लेकर पांचवीं कक्षा तक बच्चों को शिक्षा दी जाती है। यह विद्यालय लंबे समय से क्षेत्र के अभिभावकों के लिए भरोसे का केंद्र बना हुआ है।
इस विद्यालय की स्थापना वर्ष 1980 में इम्पेरियर स्कूल के नाम से समाजसेवी शिव कुमार प्रसाद द्वारा की गई थी। उनका उद्देश्य था कि कम शुल्क में बच्चों को अच्छी और मजबूत आधार वाली शिक्षा दी जाए, ताकि यहां के बच्चे आगे चलकर उच्च पदों पर पहुंचें और अपने क्षेत्र के साथ-साथ विद्यालय का नाम भी रोशन करें। विद्यालय से पढ़े कई छात्र आज विभिन्न प्रतिष्ठित पदों पर कार्यरत हैं और अपने क्षेत्र में पहचान बना चुके हैं।
कुछ तकनीकी कारणों से वर्ष 2010 में विद्यालय का नाम बदलकर जानकी शिशु महाविहार कर दिया गया। वर्तमान में इसके निदेशक अधिवक्ता रणधीर रंजन मंटू हैं, जो संस्थापक के उद्देश्य को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षा सेवा का माध्यम है और इसे व्यवसाय नहीं बनाया जाना चाहिए। इसी सोच के साथ विद्यालय में कम शुल्क में बेहतर शिक्षा देने का प्रयास लगातार जारी है।

विद्यालय के प्राचार्य संजय कुमार, जो पिछले 28 वर्षों से यहां कार्यरत हैं, ने बताया कि यहां रि-नामांकन के नाम पर मात्र 500 रुपये का शुल्क लिया जाता है। विद्यालय में किताबें हर साल बदलने की बाध्यता नहीं है और अभिभावकों को कॉपी, किताब या यूनिफॉर्म विद्यालय से ही खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जाता, क्योंकि विद्यालय द्वारा स्वयं कोई भी चीज नहीं बेचा जाता है। अभिभावक अपनी सुविधा के अनुसार कहीं से भी ये सामग्री खरीद सकते हैं। विद्यालय की ओर से केवल टाई, बेल्ट, स्कूल डायरी और पहचान पत्र बहुत ही कम शुल्क पर उपलब्ध कराया जाता है।
विद्यालय द्वारा कंप्यूटर की भी शिक्षा दिया जाता है ताकि इस क्षेत्र में भी बच्चों की पकड़ मजबूत हो।
हर सप्ताह बच्चों का जांच परीक्षा लिया जाता है, जिससे पता चलता है कि बच्चों का कितना विकास हुआ और जो क्षेत्र में जो बच्चे कमजोर हैं, उन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
उन्होंने बताया कि विद्यालय का अपना भवन है और बच्चों के खेलने के लिए बड़ा मैदान उपलब्ध है। छोटे बच्चों के लिए विभिन्न प्रकार के खिलौने तथा झूले लगाए गए हैं, ताकि पढ़ाई के साथ-साथ उनका शारीरिक और मानसिक विकास भी हो सके।
दूर दराज के बच्चों के लिए वाहन की भी सुविधा उपलब्ध है।
विद्यालय में पढ़ाई की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाता है और कमजोर छात्रों को अतिरिक्त मार्गदर्शन दिया जाता है, ताकि वे भी बेहतर प्रदर्शन कर सकें। अनुभवी शिक्षक एवं शिक्षिकाओं द्वारा गुणवत्ता पूर्वक शिक्षा दी जाती है
विद्यालय प्रबंधन का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल बच्चों को पढ़ाना ही नहीं, बल्कि उनकी मजबूत शैक्षणिक नींव तैयार करना है, ताकि वे आगे चलकर अपने माता-पिता, समाज और विद्यालय का नाम रोशन कर सकें।





