सरकारी भूमि अतिक्रमण: परिभाषा, प्रकार, कानूनी प्रक्रिया और अधिकारों की संपूर्ण जानकारी

Written by Sanjay Kumar

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सरकारी भूमि का अतिक्रमण (Encroachment of Government Land) उस स्थिति को कहा जाता है, जब कोई व्यक्ति या समूह बिना किसी वैध कानूनी अधिकार के सार्वजनिक या सरकारी भूमि—जैसे सड़क, नाला, स्कूल, तालाब, शमशान, कब्रिस्तान आदि—पर अवैध रूप से कब्जा कर लेता है, निर्माण करता है या उसका उपयोग करता है। ऐसी भूमि पर किसी निजी व्यक्ति का मालिकाना हक नहीं होता और उसका उपयोग जनहित के लिए निर्धारित होता है। इसलिए सरकारी भूमि पर अतिक्रमण न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि यह सार्वजनिक हित के भी विरुद्ध है।
भूमि के प्रकार
भूमि को मुख्यतः दो श्रेणियों में बांटा जाता है—
खास गैर मजरूआ (Gairmajarua Khas):
इस भूमि का मालिक कोई निजी व्यक्ति या परिवार होता है, जिसका नाम खतियान में दर्ज रहता है। इसका उपयोग निजी कार्यों के लिए किया जाता है और इसकी सुरक्षा व विकास की जिम्मेदारी भूमि स्वामी की होती है।

आम गैर मजरूआ (Gairmajarua Aam):
इस भूमि का स्वामित्व सरकार के पास होता है और इसका उपयोग सार्वजनिक कार्यों—जैसे सड़क, नाले, स्कूल, तालाब, शमशान, कब्रिस्तान आदि—के लिए किया जाता है। इस पर अवैध कब्जा पाए जाने पर सरकार को इसे वापस लेने का पूरा अधिकार है।
बिहार लोक भूमि अतिक्रमण अधिनियम, 1956 के तहत प्रक्रिया
सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए निम्नलिखित चरण अपनाए जाते हैं—
शिकायत या संज्ञान:
किसी भी सरकारी या सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण की शिकायत मिलने पर या प्रशासन द्वारा स्वतः संज्ञान लेने पर प्रक्रिया शुरू होती है।
नोटिस जारी करना:
अंचल अधिकारी या सक्षम प्राधिकारी द्वारा अधिनियम की धारा 4 के तहत अतिक्रमणकर्ता को नोटिस जारी किया जाता है, जिसमें उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है।
बचाव प्रस्तुत करने का अवसर:
नोटिस प्राप्त होने के बाद अतिक्रमणकर्ता अपने पक्ष में साक्ष्य और दस्तावेज प्रस्तुत कर सकता है।
जांच और रिपोर्ट:
अंचल अधिकारी/तहसीलदार स्थल निरीक्षण कर जांच करते हैं और अतिक्रमण की पुष्टि होने पर रिपोर्ट तैयार करते हैं।
कलेक्टर का आदेश:
जांच में अतिक्रमण सिद्ध होने पर कलेक्टर धारा 6 के तहत अतिक्रमण हटाने का आदेश जारी करते हैं। आदेश की अवहेलना पर एक वर्ष तक की कैद, 20 हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
बलपूर्वक निष्कासन:
आदेश के बावजूद अतिक्रमण न हटाने पर धारा 7 के तहत बलपूर्वक अतिक्रमण हटाया जाता है और खर्च की वसूली भी की जा सकती है।
अपील का अधिकार:
कलेक्टर के अंतिम आदेश के विरुद्ध धारा 11 के तहत उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।
प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) और अपवाद
कुछ विशेष परिस्थितियों में सरकारी भूमि पर मालिकाना हक का दावा प्रतिकूल कब्जे के सिद्धांत पर किया जा सकता है। इसके लिए यह सिद्ध करना आवश्यक है कि कब्जा कम-से-कम 30 वर्षों तक निरंतर, खुले रूप में, सरकार की जानकारी में और शांतिपूर्वक रहा हो। इसके प्रमाण के तौर पर बिजली बिल, पानी बिल, पुराने दस्तावेज आदि प्रस्तुत करने होते हैं तथा राजस्व विभाग में आवेदन देकर न्यायालय में इसे सिद्ध करना पड़ता है। कुछ राज्यों में पुराने कब्जेदारों और भूमिहीनों के लिए कलेक्टर दर भुगतान पर मालिकाना हक देने के प्रावधान भी बनाए जा रहे हैं।
निष्कर्ष
अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों और मानवाधिकारों के अनुरूप एक न्यायिक प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक हित की रक्षा करना है। इसलिए आम नागरिकों का यह दायित्व है कि वे कानून का पालन करें और सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने में प्रशासन का सहयोग करें।
विकास शर्मा
अधिवक्ता
पटना उच्च न्यायालय
कानूनी सलाहकार (BAPD)

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