हरिओम कुमार
हरनौत (अपना नालंदा)। प्रखंड के पोआरी पंचायत अंतर्गत नवसृजित प्राथमिक विद्यालय (एनपीएस) धरमपुर में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। स्कूल में न तो शौचालय है, न पेयजल की व्यवस्था, और न ही पक्का भवन। शिक्षा व्यवस्था को सशक्त और समावेशी बनाने के दावों के बीच इस विद्यालय में पढ़ने वाले 87 छात्र-छात्राएं आज भी जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
स्थापना को 11 साल, अब तक नहीं मिला अपना भवन
20 नवंबर 2014 को स्थापित इस स्कूल को आज तक अपना भवन नहीं मिला है। पहले यह विद्यालय धरमपुर गांव के इंद्रदेव यादव के खपरैल दलान में संचालित होता था। जनवरी 2025 से इसे अधिकारियों के निर्देश पर लंघौरा गांव स्थित बृंद सिंह के एक जर्जर पक्के मकान में स्थानांतरित कर दिया गया है, जिसकी हालत भी बेहद खराब है।
गांव में उपलब्ध है जमीन, एनओसी की प्रतीक्षा
पंचायत के मुखिया प्रतिनिधि बरे पासवान सहित ग्रामीण राजू यादव, डबल यादव, पप्पू यादव आदि ने बताया कि धरमपुर गांव में 8 कट्ठा गैरमजरुआ जमीन उपलब्ध है। यदि अंचलाधिकारी द्वारा एनओसी जारी कर दी जाती, तो विद्यालय के लिए भवन का निर्माण कराया जा सकता था। ग्रामीणों ने इसके लिए बार-बार मांग की है।
प्रधानाध्यापक ने गिनाई समस्याएं
विद्यालय के प्रधानाध्यापक ओम प्रकाश ने बताया कि विद्यालय में वर्ग 1 से 5 तक 87 बच्चे नामांकित हैं, जिनकी पढ़ाई के लिए चार शिक्षक कार्यरत हैं। स्कूल में केवल एक कमरा और दो हॉलनुमा जर्जर कमरे हैं। शौचालय न होने के कारण छात्रों और शिक्षकों को खुले में जाना पड़ता है, जिससे विशेष रूप से छात्राओं और महिला शिक्षिकाओं को भारी कठिनाई होती है।
विद्यालय में पेयजल की भी कोई व्यवस्था नहीं है। बच्चे प्यास से परेशान रहते हैं। बिजली की सुविधा भी नहीं है, जिससे गर्मी में पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता है और अंधेरे में सीढ़ियों से कक्ष तक जाना पड़ता है।
बरसात में टपकता है पानी, भीग जाते हैं किताब-कॉपी
विद्यालय के छत एस्बेस्टस व खपरा से बने हैं, जो अत्यंत जर्जर हैं। छात्रों सुप्रिया कुमारी, संदीप कुमार, ज्योति कुमारी, उदयशंकर कुमार, कार्तिक और आयुष ने बताया कि बरसात के समय छत से पानी टपकता है, जिससे कक्षा और कॉपियां-किताबें भीग जाती हैं। तेज बारिश और आंधी में डर के मारे बच्चों का “करेजा कांपने” लगता है।
खुले आसमान के नीचे बनता है मिड-डे-मील, बरसात में खाना नहीं

विद्यालय में रसोईघर नहीं है। मात्र एक रसोइया मालती देवी कार्यरत हैं, जिन्हें खुले आसमान के नीचे लकड़ी से खाना बनाना पड़ता है। गैस चूल्हे और स्टोर की व्यवस्था नहीं है। बरसात के दिनों में लकड़ियां भीग जाने पर भोजन नहीं बनता और बच्चे भूखे ही घर लौट जाते हैं। रसोइया ने कहा कि खाना बनाने में अत्यधिक परेशानी होती है।

प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी बोले – नहीं थी जानकारी
इस संबंध में पूछे जाने पर प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (BEO) नितेश कुमार रंजन ने कहा कि मामला अब तक संज्ञान में नहीं था। उन्होंने जल्द ही इसकी जांच कर आवश्यक कार्रवाई का भरोसा दिया।






